लंकाकांड दोहा (45)
लंकाकांड दोहा 45 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड। रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड।।44।। भावार्थ: वानर वीर एक-एक राक्षस को कुचलते हुए उसके सिर तोड़कर उछाल देते हैं। वे कटे हुए सिर रावण के सामने इस प्रकार गिरते हैं, मानो दही से भरे मटके फूट-फूटकर गिर रहे हों। विस्तृत विवेचन: इस दोहे में तुलसीदास जी ने वानर सेना के अद्भुत पराक्रम और रावण की सेना की दयनीय दशा का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया है। वानर वीरों का उत्साह और बल इतना प्रचंड है कि वे राक्षसों को एक-एक करके मारते हुए उनके सिर तोड़ डालते हैं। यह केवल शारीरिक बल का वर्णन नहीं, बल्कि धर्म की शक्ति का भी प्रतीक है। कटे हुए सिरों की तुलना “दधि कुंड” (दही के मटके) से करना एक सजीव उपमा है। जैसे दही के मटके टूटने पर दही चारों ओर फैल जाती है, वैसे ही राक्षसों के सिर रावण के सामने बिखरते चले जाते हैं। इससे रावण के अहंकार पर गहरा प्रहार होता है। वह अपने महलों में बैठा युद्ध की खबरें सुन रहा है, और उसके सामने अपने योद्धाओं के कटे हुए सिर गिरते देख उसका मन भय और ग्लानि से भर जाता है। यह दोहा य...