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लंकाकांड चौपाई(780-787) एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई(780-787) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू।। खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती।। अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा।। कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे।। पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा।। सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला।। पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं।। उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी।। छं0-सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही।। ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी।। भावार्थ (सरल हिंदी में) लक्ष्मत क्रोध में भरकर कहते हैं— “अरे दुष्ट! तू बंदर-भालुओं को क्यों मारता है? मुझसे लड़, मैं ही तेरी मृत्यु हूँ। इस पर रावण कहता है:  मैं तुझे बहुत समय से खोज रहा था, क्योंकि तूने मेरे पुत्र का वध किया है। आज मैं तुझे मारकर अपने हृदय की आग शांत करूँगा।” ऐसा कहकर रावण भयंकर...

लंकाकांड दोहा(82)

 लंकाकांड दोहा(82) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ।।82।। भावार्थ : जब लक्ष्मण जी ने अपनी सेना (वानर दल) को व्याकुल और संकट में देखा, तब उन्होंने कमर में तरकस (तीर रखने का पात्र) कस लिया और हाथ में धनुष उठा लिया। वे अत्यंत क्रोधित होकर, पहले श्रीराम के चरणों में सिर झुकाकर, युद्ध के लिए निकल पड़े। विस्तृत विवेचन: यह दोहा युद्ध के उस भावुक और वीर क्षण को दर्शाता है जब लक्ष्मण जी अपने कर्तव्य और भाई-भक्ति दोनों का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। सेना की स्थिति: वानर सेना रावण की शक्तिशाली सेना से परेशान होकर बिखरने लगती है। यह देखकर लक्ष्मण जी का हृदय व्यथित हो उठता है। वीरता का जागरण: लक्ष्मण तुरंत तैयार हो जाते हैं—तरकस बांधते हैं और धनुष उठा लेते हैं। यह उनके तत्पर और निर्भीक योद्धा स्वभाव को दिखाता है। क्रोध और धर्म: उनका क्रोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए है। मर्यादा और भक्ति: युद्ध पर जाने से पहले वे श्रीराम के चरणों में सिर झुकाते हैं। इससे उनकी विनम्रता, अनुशासन और प्रभु के...

लंकाकांड चौपाई (772-779) एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई (772-779) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर।। गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा।। लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू।। चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी।। इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा।। चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना।। पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई।। तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने।। छं0-संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं।। भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे।। भावार्थ : रावण अत्यंत क्रोधित होकर युद्धभूमि में दौड़ पड़ा। उसे सामने आता देख वानर (जैसे हनुमान, अंगद आदि) जोर-जोर से ललकारने लगे। वानरों ने पेड़, पत्थर, पहाड़ उठाकर रावण पर एक साथ फेंक दिए, लेकिन रावण का शरीर वज्र (इंद्र के अस्त्र) जैसा कठोर था—उन सबका उस पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि वे टुकड़े-टुकड़े होकर टूट गए। रावण अपने रथ पर स्थिर खड़...

लंकाकांड दोहा (81)

 लंकाकांड दोहा (81) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप। रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप।।81।। भावार्थ : जब रावण ने अपनी सेना को डरकर भागते हुए देखा, तब उसने अपनी बीस भुजाओं में दस धनुष उठाए और रथ पर चढ़कर घमंड से भरे हुए शब्दों में “वापस लौटो, वापस लौटो” कहते हुए युद्धभूमि की ओर चला। विस्तृत विवेचन: इस दोहे में युद्ध की स्थिति का सजीव चित्रण है। जब रावण की सेना वानरों के प्रबल आक्रमण से घबरा कर भागने लगती है, तब रावण को यह देखकर क्रोध और अहंकार दोनों आ जाते हैं। सेना का विचलित होना: वानर सेना के पराक्रम से राक्षस दल भयभीत होकर पीछे हटने लगता है। इससे स्पष्ट है कि धर्म पक्ष (राम की सेना) का बल और उत्साह अधिक था। रावण का अहंकार और वीरता: रावण अपनी बीस भुजाओं में दस धनुष लेकर रथ पर सवार होता है। यह उसके अद्भुत बल और युद्ध कौशल को दिखाता है, लेकिन साथ ही उसका अहंकार (दाप) भी झलकता है। “फिरहु फिरहु” का अर्थ: रावण अपनी सेना को ललकारते हुए कहता है—“भागो मत, वापस आओ और युद्ध करो।” यह उसके सेनापति होने के कर्तव्य को दिखाता है, परंतु उसके शब्दों मे...

लंकाकांड चौपाई (764-771) एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई(764-771) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना।। हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा।। सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते।। एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं।। मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं।। उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं।। निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू।। बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे।। छं0-क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं।। मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं।। धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं।। धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही।। यह अंश रामचरितमानस के लंका कांड से लिया गया है। इसमें युद्ध का अत्यंत जीवंत और भयंकर वर्णन है। 🔶 भावार्थ (Simple ...

लंकाकांड दोहा (80)

 लंकाकांड दोहा (80) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।80(क)।। सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज। एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज।।80(ख)।। उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान। लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन।।80(ग)।। भावार्थ (सरल): भगवान श्रीराम कहते हैं—हे मित्र! जो व्यक्ति इस संसार रूपी महान शत्रु को जीत सकता है, वही सच्चा वीर है, और उसके पास एक दृढ़ “धर्मरथ” (आध्यात्मिक रथ) होता है। यह सुनकर विभीषण प्रसन्न होकर श्रीराम के चरण पकड़ लेते हैं और कहते हैं—हे कृपा के सागर! आपने मुझे उपदेश देकर अनुग्रह किया। उधर रावण की सेना और इधर राम की ओर से अंगद-हनुमान आदि वीर अपने-अपने स्वामी के लिए युद्ध कर रहे हैं। विस्तृत विवेचन: संसार रूपी शत्रु का अर्थ यहाँ “संसार” को सबसे बड़ा शत्रु कहा गया है—क्योंकि इसमें मोह, लोभ, क्रोध, अहंकार जैसे दोष हैं। श्रीराम बताते हैं कि असली वीर वही है जो इन आंतरिक शत्रुओं पर विजय पा ले। धर्मरथ का रहस्य “रथ” यहाँ प्रतीक है— सत्य = पहिए धैर्य = धुरी बल = घोड़े विवेक = सारथी ...

लंकाकांड चौपाई (753-763)

 लंकाकांड चौपाई (753-763) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।। सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।। सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।। दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।। अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।। कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।। सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।। यह चौपाई रामचरितमानस के लंकाकांड की अत्यंत प्रसिद्ध “धर्मरथ उपदेश” है, जिसमें भगवान श्रीराम विभीषण को सच्ची विजय का रहस्य बताते हैं। 🔹 भावार्थ (सरल भाषा में) विभीषण डरकर कहते हैं— “प्रभु! रावण तो रथ पर है और आप बिना रथ के हैं, न आपके पास कवच है, न जूते—आप उसे कैसे जीतेंगे?” तब श्रीराम मुस्कुराकर कहते हैं— “हे मित्र! सच्चा रथ भौतिक नहीं, बल्कि गुणों का होता है। जिसके पा...