लंकाकांड दोहा (81)

 लंकाकांड दोहा (81) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।

रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप।।81।।

भावार्थ :

जब रावण ने अपनी सेना को डरकर भागते हुए देखा, तब उसने अपनी बीस भुजाओं में दस धनुष उठाए और रथ पर चढ़कर घमंड से भरे हुए शब्दों में “वापस लौटो, वापस लौटो” कहते हुए युद्धभूमि की ओर चला।

विस्तृत विवेचन:

इस दोहे में युद्ध की स्थिति का सजीव चित्रण है। जब रावण की सेना वानरों के प्रबल आक्रमण से घबरा कर भागने लगती है, तब रावण को यह देखकर क्रोध और अहंकार दोनों आ जाते हैं।

सेना का विचलित होना:

वानर सेना के पराक्रम से राक्षस दल भयभीत होकर पीछे हटने लगता है। इससे स्पष्ट है कि धर्म पक्ष (राम की सेना) का बल और उत्साह अधिक था।

रावण का अहंकार और वीरता:

रावण अपनी बीस भुजाओं में दस धनुष लेकर रथ पर सवार होता है। यह उसके अद्भुत बल और युद्ध कौशल को दिखाता है, लेकिन साथ ही उसका अहंकार (दाप) भी झलकता है।

“फिरहु फिरहु” का अर्थ:

रावण अपनी सेना को ललकारते हुए कहता है—“भागो मत, वापस आओ और युद्ध करो।”

यह उसके सेनापति होने के कर्तव्य को दिखाता है, परंतु उसके शब्दों में घमंड भी है।

धर्म vs अधर्म का संकेत:

यहाँ एक गहरा संदेश है कि जब अधर्म (रावण) संकट में पड़ता है, तो वह अहंकार के सहारे ही स्थिति संभालने की कोशिश करता है, जबकि धर्म (राम) शांति और नीति से विजय प्राप्त करता है।

निष्कर्ष:

यह दोहा रावण के अहंकार, वीरता और संकट की घड़ी में नेतृत्व को दर्शाता है, साथ ही यह भी बताता है कि केवल बल और घमंड से विजय संभव नहीं होती।

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