लंकाकांड चौपाई (376-383)
लंकाकांड चौपाई (376-383) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे।।
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ।।
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा।।
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा।।
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा।।
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं।।
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई।।
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं।।
चौपाइयों का भावार्थ व विस्तृत विवेचन
🔹 चौपाई
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे।
मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे।।
भावार्थ:
लंका के किले और उनकी कंगूरियाँ ऐसे शोभायमान हो रही थीं, मानो सुमेरु पर्वत की चोटियों पर घने बादल छा गए हों।
विवेचन:
यहाँ तुलसीदास जी ने लंका के दुर्ग की भव्यता दिखाई है। ऊँचे-ऊँचे किले, उन पर खड़े राक्षस और सैनिक—सब मिलकर सुमेरु पर्वत पर छाए मेघों जैसा दृश्य बना रहे हैं। इससे युद्ध की विराटता और भयावहता का संकेत मिलता है।
🔹 चौपाई
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ।
सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ।।
भावार्थ:
युद्ध के ढोल और नगाड़े बजने लगे, जिनकी ध्वनि सुनकर वीरों का मन उत्साह से भर गया।
विवेचन:
युद्ध-वाद्यों की आवाज़ सैनिकों में वीर रस जगाती है। यह ध्वनि साहस, जोश और पराक्रम को बढ़ाती है। यहाँ वानर और राक्षस—दोनों सेनाओं का उत्साह दिखाया गया है।
🔹 चौपाई
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा।
सुनि कादर उर जाहिं दरारा।।
भावार्थ:
भेरी और नफीरी जैसे वाद्य ज़ोर-ज़ोर से बजने लगे, जिन्हें सुनकर कायरों का हृदय कांप उठा।
विवेचन:
यह पंक्ति बताती है कि युद्ध केवल वीरों की परीक्षा नहीं, कायरों के भय का भी कारण बनता है। शत्रु-सेना में भय और घबराहट फैलने लगती है।
🔹 चौपाई
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा।
अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा।।
भावार्थ:
वानर सेना की सज्जा देखने योग्य थी। भालू और वानर अत्यंत विशाल शरीर वाले और श्रेष्ठ योद्धा थे।
विवेचन:
यहाँ वानर-भालुओं की शक्ति और संगठन का वर्णन है। वे साधारण नहीं, बल्कि असाधारण पराक्रमी योद्धा हैं, जिन्हें देखकर शत्रु चकित हो जाए।
🔹 चौपाई
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा।
पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा।।
भावार्थ:
वे दौड़ते हैं, कठिन रास्तों की परवाह नहीं करते, पर्वतों को तोड़कर भी अपना मार्ग बना लेते हैं।
विवेचन:
वानर सेना की अलौकिक शक्ति यहाँ स्पष्ट होती है। उनके लिए कोई बाधा बड़ी नहीं—यह राम-कार्य के प्रति उनकी निष्ठा और बल का प्रतीक है।
🔹 चौपाई
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं।
दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं।।
भावार्थ:
करोड़ों योद्धा दाँत किटकिटाते हुए गर्जना कर रहे हैं और होंठ काटकर शत्रु को ललकार रहे हैं।
विवेचन:
यह युद्ध-पूर्व की उग्र मानसिक अवस्था को दर्शाता है। क्रोध, प्रतिशोध और विजय की तीव्र इच्छा स्पष्ट झलकती है।
🔹 चौपाई
उत रावन इत राम दोहाई।
जयति जयति जय परी लराई।।
भावार्थ:
एक ओर “रावण की जय” और दूसरी ओर “राम की जय” के नारे लग रहे हैं, और भयंकर युद्ध छिड़ गया।
विवेचन:
यह धर्म और अधर्म का सीधा संघर्ष है। दोनों पक्ष अपने-अपने नायक का जयघोष कर रहे हैं, जिससे युद्ध का रोमांच चरम पर पहुँच जाता है।
🔹 चौपाई
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं।
कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं।।
भावार्थ:
राक्षस पर्वत-शिखरों को गिरा देते हैं और वानर उन्हें कूदकर पकड़ते हैं तथा फिर शत्रुओं पर फेंक देते हैं।
विवेचन:
यह युद्ध की अद्भुत और अलौकिक शैली को दर्शाता है। वानर और राक्षस दोनों ही पर्वतों को हथियार की तरह प्रयोग कर रहे हैं, जिससे युद्ध की भयंकरता और कल्पनातीत शक्ति प्रकट होती है।
✨ समग्र निष्कर्ष
इन चौपाइयों में लंका युद्ध का विराट, भयानक और रोमांचक दृश्य सामने आता है।
वाद्यों की गूँज
सेनाओं का उत्साह
वानर-भालुओं का पराक्रम
और राम–रावण का धर्मयुद्ध
सब मिलकर वीर रस का उत्कर्ष रचते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि यह युद्ध केवल दो सेनाओं का नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का निर्णायक संग्राम है।
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