लंका काण्ड चौपाई (151-160)
लंका काण्ड चौपाई 151-160 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।
प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।।
पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा।।
बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।।
तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई।।
निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।।
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।।
भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी।।
अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।।
बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।
भावार्थ :
अंगद प्रभु राम के चरणों को हृदय में रखकर विनम्रता से निकल पड़े। उनकी स्वाभाविक वीरता और तेज देखकर राक्षस घबरा गए। रावण का बेटा जो पहले खेलता-कूदता घूम रहा था, बातों-बात में अंगद से भिड़ने लगा। उसने पैर उठाकर अंगद को मारना चाहा, पर अंगद ने उसका पैर पकड़कर उसे धरती पर पटक दिया—धरती हिल उठी।
यह देखकर राक्षसों में भारी भय फैल गया। सब समझ गए कि उसे मार दिया गया है पर डर के कारण कह न सके। पूरा नगर कोलाहल से भर गया—सब सोचने लगे कि यह वही वानर है जिसने लंका जलाई थी। अब हमारे साथ क्या होने वाला है?
विस्तृत विवेचन
1. “बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ…”
अंगद अपने हृदय में राम के चरणों की शक्ति और आशीर्वाद धारण कर चले। इससे यह संकेत है कि सच्चा वीर अपने बल पर नहीं, ईश्वर की कृपा पर चलता है।
2. “प्रभु प्रताप उर सहज असंका…”
राम के प्रताप का प्रभाव ऐसा है कि अंगद के भीतर साहस अपने आप बढ़ जाता है; शत्रु पक्ष में भी असंका (भय) स्वतः उत्पन्न हो जाता है।
3. रावण का बेटा अंगद से भिड़ता ह
रावण का बेटा अब तक खेल रहा था। अहंकार में भरकर उसने अंगद को साधारण वानर समझा।
यहाँ तुलसीदास जी दिखाते हैं—
मूर्ख व्यक्ति पराक्रमी को पहचान नहीं पाता और बिना सोचे भिड़ जाता है।
4. “तेहि अंगद कहुँ लात उठाई…”
रावण के बेटे ने पैर उठाकर अंगद को लात मारनी चाही, पर अंगद ने उसका पैर पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया।
ज़मीन हिलने का अर्थ —
अंगद की वीरता
राक्षस लड़के का अंत
लंका में भय का आगमन
5. “निसिचर निकर देखि भट भारी…”
यह दृश्य देखकर सारे राक्षस सिपाही डर गए। वे रो भी नहीं सके, बोल भी नहीं सके।
क्योंकि:
उन्हें संकट दिख रहा था
रामदूत की शक्ति समझ में आ गई थी
कह नहीं सकते थे कि राक्षस राजकुमार मर गया है, वरना रावण क्रोधित होगा
6. “भयउ कोलाहल नगर मझारी…”
पूरा लंका-नगर भय से भर उठा।
सभी ने सोचा — “अब तो वही वानर आया है जिसने लंका जलाई थी… अब हमारा क्या होगा?”
7. “अब धौं कहा करिहि करतारा…”
सब चिंतित हैं —
अब रावण क्या करेगा? क्या समाधान निकलेगा?
8. “बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई…”
राक्षस बिना पूछे रास्ता बताने लगते हैं —
क्योंकि भय इतना था कि
जिसे देखते, वही डरकर सूख जाता।
सार
इस चौपाई में तुलसीदास जी यह दिखाते हैं कि
अहंकार का पतन निश्चित है
ईश्वर के दूत का तेज अजेय होता ह
राम-नाम का आधार रखने वाले के सामने बड़ा से बड़ा योद्धा भी टिक नहीं सकता
भय की जड़ पाप और अन्याय है
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