लंकाकांड चौपाई (669-681)
लंकाकांड चौपाई (669-681) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना।। डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना।। दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई।। धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना।। गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं।। अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर।। जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर।। मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला।। पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन।। पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा।। ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी।। नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना।। रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो।। भावार्थ : मेघनाद अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र (शक्ति, त्रिशूल, तलवार, गदा आदि) और पर्वत, वृक्ष, पत्थर फेंकता है। उसके बाणों की ऐसी वर्षा होती है कि आकाश चारों ओर से ढक जाता है, जैसे घने बादल बरस रहे हों। चारों दिशाओं में “मारो-मारो” की आवाज़ गूंज...