लंकाकांड दोहा (72)
लंकाकांड दोहा (72) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।।
गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास।।72।।
भावार्थ :
मेघनाद (इंद्रजीत) मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में चला गया और जोर-जोर से हँसते हुए गर्जना करने लगा। उसकी भयानक हँसी और गर्जना से वानर सेना (कपि कटक) में भय फैल गया।
विस्तृत विवेचन:
यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड का है, जहाँ मेघनाद (रावण का पुत्र) अपनी माया और युद्ध-कौशल का प्रदर्शन करता है।
मायामय रथ का अर्थ
मेघनाद का रथ साधारण नहीं था, बल्कि मायावी था—अर्थात वह अदृश्य होकर, आकाश में उड़कर और छल से युद्ध कर सकता था। यह उसकी असुर शक्ति और तांत्रिक विद्या को दर्शाता है।
आकाश में युद्ध (गुरिल्ला शैली)
वह आकाश में जाकर लड़ता है, जिससे वानर सेना उसे ठीक से देख नहीं पाती। यह रणनीति शत्रु को भ्रमित करने और डराने के लिए थी।
अट्टहास और गर्जना
उसका जोर से हँसना (अट्टहास) केवल खुशी नहीं, बल्कि मानसिक युद्ध (psychological attack) है—जिससे शत्रु का मनोबल टूट जाए।
वानर सेना में भय
हनुमान और अन्य वीरों की सेना भी कुछ समय के लिए घबरा जाती है, क्योंकि वे ऐसे मायावी युद्ध के आदी नहीं थे।
मुख्य संदेश:
केवल शारीरिक बल नहीं, माया और बुद्धि भी युद्ध में महत्वपूर्ण होती है।
परंतु अधर्म की शक्ति (जैसे मेघनाद) अंत में धर्म के सामने टिक नहीं पाती।
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