लंकाकांड चौपाई (495--502)

 लंकाकांड चौपाई (495-502) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू।।

सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही।।

यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई।।

संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी।।

ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर।।

तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना।।

जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना।।

धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता।।

भावार्थ:

🔹 1.

“सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू।।

सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही।।”

भावार्थ:

भगवान शिव, पार्वती जी से कहते हैं—जिसका क्रोध अग्नि के समान है और जो चौदहों लोकों को जला सकता है, उसे युद्ध में कौन जीत सकता है? देवता, मनुष्य और समस्त जगत उसकी सेवा करते हैं।

👉 यहाँ श्रीराम की महाशक्ति और पराक्रम का वर्णन है।

🔹 2.

“यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई।।

संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी।।”

भावार्थ:

इस अद्भुत लीला को वही जान सकता है जिस पर श्रीराम की कृपा हो। संध्या हो गई, तब दोनों सेनाएँ (राम और रावण की) अपनी-अपनी सेना को व्यवस्थित करने लगीं।

👉 युद्ध के बीच विराम का दृश्य है।

🔹 3.

“ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर।।

तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना।।”

भावार्थ:

जो व्यापक, अजन्मा और अजेय परमब्रह्म हैं, वही श्रीराम करुणा से लक्ष्मण का हाल पूछते हैं। तब तक हनुमान जी लक्ष्मण को उठाकर ले आते हैं। लक्ष्मण को मूर्छित देखकर श्रीराम अत्यंत दुखी होते हैं।

👉 यहाँ श्रीराम का भाई-प्रेम प्रकट होता है।

🔹 4.

“जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना।।

धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता।।”

भावार्थ:

जामवंत जी ने कहा—लंका में वैद्य सुषेण रहते हैं, उन्हें बुलाया जाए। हनुमान जी छोटे रूप में लंका गए और पूरे भवन सहित सुषेण वैद्य को उठा लाए।

👉 हनुमान जी की बुद्धि, शक्ति और तत्परता का वर्णन है।

✨ समग्र विवेचन (Short Summary)

श्रीराम की अपार शक्ति और दिव्यता।

लक्ष्मण के प्रति राम का करुणामय प्रेम।

हनुमान जी की सेवा-भावना और वीरता।

भगवान की लीला को वही समझ सकता है जिस पर उनकी कृपा हो।

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