लंकाकांड दोहा (59)

 लंकाकांड दोहा (59) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।

बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि।।58।।

प्रसंग

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड का है।

जब हनुमान संजीवनी बूटी लेकर लौट रहे थे, तब अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत ने उन्हें देखा।

भावार्थ :

भरत जी ने आकाश में एक बहुत विशाल आकृति देखी।

उन्हें लगा कि यह कोई बड़ा राक्षस (निशाचर) है।

इसलिए उन्होंने बिना नोक वाला बाण (फल रहित सायक) धनुष पर चढ़ाकर कान तक खींचा और उसे मार दिया।

🪔 विस्तृत विवेचन

भरत जी की सतर्कता –

वे नंदिग्राम में रहकर श्रीराम की प्रतीक्षा कर रहे थे। अयोध्या की रक्षा उनका धर्म था। इसलिए अज्ञात विशाल रूप देखकर उन्होंने तुरंत निर्णय लिया।

बिनु फर सायक –

उन्होंने नोक रहित बाण चलाया।

➤ इसका अर्थ है कि वे मारना नहीं चाहते थे, केवल रोकना या गिराना चाहते थे।

➤ यह उनके दयालु और धर्मनिष्ठ स्वभाव को दिखाता है।

चाप श्रवन लगि तानि –

धनुष को कान तक खींचना वीरता और पूर्ण शक्ति का प्रतीक है।

🌟 सीख

सच्चा रक्षक सदैव सतर्क रहता है।

शक्ति के साथ दया भी आवश्यक है।

भरत जी का चरित्र त्याग, प्रेम और धर्म का आदर्श है।

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