लंकाकांड दोहा (63)

 लंकाकांड दोहा (63) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा:

“राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।

रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक।।63।। ”

1. भावार्थ

इस दोहे में बताया गया है कि कुंभकर्ण जब भगवान राम के रूप और गुणों का स्मरण करता है, तो वह एक क्षण के लिए उनमें मग्न हो जाता है। लेकिन अगले ही क्षण उसका राक्षसी स्वभाव जाग जाता है और वह रावण से करोड़ों घड़े मदिरा और बहुत-से भैंसे खाने के लिए मांगता है।

2. विस्तृत विवेचन

यह दोहा लंका कांड के उस प्रसंग का है जब कुंभकर्ण को नींद से जगाया जाता है। जागने के बाद उसे राम-रावण युद्ध की स्थिति बताई जाती है।

जब कुंभकर्ण को राम के बारे में बताया जाता है, तो वह उनके दिव्य रूप और महान गुणों का स्मरण करता है।

उस समय उसके हृदय में क्षण भर के लिए भक्ति और श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाता है और वह भगवान राम के स्मरण में मग्न हो जाता है।

परंतु क्योंकि वह राक्षस कुल में जन्मा और तामसिक प्रवृत्ति वाला है, इसलिए यह भाव अधिक देर नहीं टिकता।

तुरंत ही उसका भोग और तामसिक स्वभाव जाग उठता है और वह युद्ध पर जाने से पहले बहुत सारी मदिरा और भैंसों का मांस मांगने लगता है।

3. आध्यात्मिक संदेश

इस दोहे से एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है—

सत्संग या भगवान का स्मरण क्षण भर के लिए भी मन को बदल सकता है।

लेकिन यदि मनुष्य की वृत्ति तामसिक और भोगप्रधान है, तो वह जल्दी ही फिर उसी पुराने स्वभाव में लौट जाता है।

अर्थात् तुलसीदास जी यह दिखाते हैं कि कुंभकर्ण में भी राम की महिमा पहचानने की क्षमता थी, परंतु उसकी तामसिक प्रवृत्ति उसे स्थायी रूप से भगवान की ओर नहीं जाने देती।

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