लंकाकांड चौपाई (535-542)

 लंकाकांड चौपाई (535-542) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।।

कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने।।

अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ।।

जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा।।

तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता।।

चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता।।

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना।।

राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी।।

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड में उस समय का है जब हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने जा रहे होते हैं और रास्ते में अयोध्या के पास भरतजी उन्हें देख लेते हैं। नीचे इन चौपाइयों का भावार्थ और संक्षिप्त विस्तृत विवेचन दिया गया है।

1️⃣ चौपाई

तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।।

कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने।।

भावार्थ :

भरतजी हनुमानजी से पूछते हैं – हे तात! श्रीराम (सुख के भंडार) की कुशलता कहो। क्या वे लक्ष्मण और माता सीता के साथ कुशलपूर्वक हैं?

तब हनुमानजी ने संक्षेप में सारी कथा बता दी। यह सुनकर भरतजी के मन में बहुत दुःख हुआ और वे पछताने लगे।

विवेचन :

भरतजी का श्रीराम के प्रति गहरा प्रेम यहाँ प्रकट होता है।

जब उन्हें पता चलता है कि लक्ष्मण युद्ध में मूर्छित पड़े हैं, तो उन्हें बहुत दुःख होता है।

वे सोचते हैं कि मैं यहाँ अयोध्या में बैठा हूँ और प्रभु संकट में हैं।

2️⃣ चौपाई

अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ।।

जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा।।

भावार्थ :

भरतजी कहते हैं – हाय! मैं किस लिए इस संसार में आया हूँ, जब मैं प्रभु के किसी भी काम नहीं आ सका।

फिर उन्होंने सोचा कि यह दुःख करने का समय नहीं है, इसलिए धैर्य धारण करके हनुमानजी से बोले।

विवेचन :

भरतजी का निस्वार्थ प्रेम और सेवा भाव दिखाई देता है।

उन्हें लगता है कि वे राम की सेवा नहीं कर पाए, इसलिए स्वयं को दोष देते हैं।

लेकिन फिर वे परिस्थिति समझकर धैर्य रखते हैं।

3️⃣ चौपाई

तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता।।

चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता।।

भावार्थ :

भरतजी कहते हैं – हे तात! यदि तुम पैदल जाओगे तो देर हो जाएगी और सुबह होने पर काम बिगड़ जाएगा।

इसलिए तुम इस पर्वत सहित मेरे बाण पर बैठ जाओ, मैं तुम्हें तुरंत वहाँ पहुँचा दूँगा जहाँ कृपा के भंडार श्रीराम हैं।

विवेचन :

भरतजी की अद्भुत शक्ति और भक्ति यहाँ दिखाई देती है।

वे अपने बाण से ही हनुमानजी को तुरंत लंका भेजने की बात कहते हैं।

इससे उनके पराक्रम का भी पता चलता है।

4️⃣ चौपाई

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना।।

राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी।।

भावार्थ :

भरतजी की बात सुनकर हनुमानजी के मन में थोड़ा अभिमान आया कि मेरे जैसे भारी को बाण कैसे ले जाएगा।

लेकिन तुरंत ही उन्होंने श्रीराम का प्रभाव याद किया और भरतजी के चरण पकड़कर हाथ जोड़कर बोले।

विवेचन :

हनुमानजी को क्षणभर के लिए अपने बल का अभिमान हो गया।

लेकिन तुरंत उन्हें याद आया कि सब श्रीराम की कृपा से ही संभव है।

इसलिए उन्होंने विनम्र होकर भरतजी के चरणों में प्रणाम किया।

✅ सार:

इन चौपाइयों में

भरतजी की राम के प्रति प्रेम और सेवा भावना

हनुमानजी की भक्ति और विनम्रता

तथा राम के प्रभाव की महिमा प्रकट होती है।

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