लंकाकांड दोहा (66)
लंकाकांड दोहा (66) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह।।66।।
भावार्थ (Simple Meaning)
वानर “जय-जय-जय” कहते हुए श्रीराम की ओर दौड़ते हैं और जोर से हुंकार भरते हैं। फिर वे एक ही बार में राक्षसों पर पहाड़, पेड़ और बड़े-बड़े पत्थर फेंक देते हैं।
🔹 विस्तृत विवेचन
इस दोहे में युद्ध का बहुत उत्साह और वीरता दिखाया गया है। जब वानर सेना को श्रीराम का स्मरण होता है, तो उनका मनोबल बहुत बढ़ जाता है।
“जय जय जय रघुबंस मनि” → वानर भगवान राम की विजय का घोष करते हैं। इससे उनकी भक्ति और आत्मविश्वास प्रकट होता है।
“धाए कपि दै हूह” → वानर जोर से गर्जना (हूह) करते हुए युद्ध में कूद पड़ते हैं। यह उनकी निर्भीकता दिखाता है।
“एकहि बार...” → वानर एक साथ ही बड़े-बड़े पर्वत, वृक्ष उठाकर शत्रु पर फेंक देते हैं, जिससे उनकी अद्भुत शक्ति और एकता दिखाई देती है।
👉 इस प्रसंग में वानर सेना केवल शारीरिक बल से नहीं, बल्कि राम भक्ति और उत्साह से भी लड़ रही है।
🔹 मुख्य संदेश
भक्ति से शक्ति मिलती है – भगवान का स्मरण करने से साहस बढ़ता है।
एकता और जोश से विजय मिलती है – मिलकर लड़ने से बड़ी से बड़ी शक्ति को हराया जा सकता है।
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