लंकाकांड चौपाई (561-572)

 लंकाकांड चौपाई (561-572) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।

तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई।।

हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।

कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा।।

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषअद पुनि पुनि सिर धुनेऊ।।

ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा।।

जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा।।

कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई।।

कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी।।

तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महामहा जोधा संघारे।।

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।।

अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा।।

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड से लिया गया है। इसमें हनुमान द्वारा संजीवनी लाने, लक्ष्मण के जागने और फिर रावण द्वारा कुम्भकर्ण को जगाने का वर्णन है।

1️⃣ चौपाई

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना।

अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।

भावार्थ:

जब हनुमानजी संजीवनी लेकर लौटे तो श्रीराम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे मिले। भगवान राम अत्यन्त कृतज्ञ और सब समझने वाले हैं, इसलिए उन्होंने हनुमानजी के महान उपकार को हृदय से स्वीकार किया।

विवेचन:

यहाँ भगवान राम का कृतज्ञ स्वभाव प्रकट होता है। वे ईश्वर होते हुए भी अपने सेवक के उपकार को मानते हैं। इससे भक्ति में सेवक और स्वामी के प्रेम का आदर्श मिलता है।

2️⃣ चौपाई

तुरत बैद तब कीन्ह उपाई।

उठि बैठे लछिमन हरषाई।।

भावार्थ:

वैद्य सुषेण ने तुरंत संजीवनी का उपचार किया, जिससे लक्ष्मणजी तुरंत उठकर बैठ गए और सब लोग प्रसन्न हो गए।

विवेचन:

संजीवनी औषधि की शक्ति और हनुमानजी की सेवा से लक्ष्मणजी पुनः जीवित हो गए। इससे यह शिक्षा मिलती है कि समय पर किया गया प्रयास जीवन बचा सकता है।

3️⃣ चौपाई

हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता।

हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।

भावार्थ:

लक्ष्मण को स्वस्थ देखकर श्रीराम ने उन्हें हृदय से लगा लिया। यह देखकर सभी वानर और भालू अत्यन्त प्रसन्न हुए।

विवेचन:

यहाँ राम-लक्ष्मण के गहरे भाई प्रेम का वर्णन है। पूरी सेना भी इस प्रेम को देखकर आनंदित हो जाती है।

4️⃣ चौपाई

कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा।

जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा।।

भावार्थ:

हनुमानजी ने वैद्य सुषेण को उसी प्रकार वापस लंका पहुँचा दिया, जैसे उन्हें वहाँ से लाए थे।

विवेचन:

हनुमानजी का स्वभाव निष्काम सेवा और मर्यादा का है। कार्य पूरा होते ही वे वैद्य को सुरक्षित लौटा देते हैं।

5️⃣ चौपाई

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ।

अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ।।

भावार्थ:

जब रावण को यह समाचार मिला कि लक्ष्मण जीवित हो गए, तो वह बहुत दुखी हुआ और बार-बार सिर पीटने लगा।

विवेचन:

रावण समझ गया कि अब राम की सेना को हराना कठिन है।

6️⃣ चौपाई

ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा।

बिबिध जतन करि ताहि जगावा।।

भावार्थ:

चिन्तित होकर रावण अपने भाई कुम्भकर्ण के पास गया और अनेक उपाय करके उसे जगाने लगा।

विवेचन:

रावण को अब अपने सबसे बलवान भाई कुम्भकर्ण की सहायता की आवश्यकता पड़ती है।

7️⃣ चौपाई

जागा निसिचर देखिअ कैसा।

मानहुँ कालु देह धरि बैसा।।

भावार्थ:

जब कुम्भकर्ण जागा तो वह ऐसा भयानक दिखाई दे रहा था मानो स्वयं काल (मृत्यु) शरीर धारण करके बैठा हो।

विवेचन:

कुम्भकर्ण की भयंकर शक्ति और विशाल रूप का चित्रण है।

8️⃣ चौपाई

कुंभकरन बूझा कहु भाई।

काहे तव मुख रहे सुखाई।।

भावार्थ:

कुम्भकर्ण ने रावण से पूछा – भाई! तुम्हारा चेहरा इतना उदास क्यों है?

9️⃣ चौपाई

कथा कही सब तेहिं अभिमानी।

जेहि प्रकार सीता हरि आनी।।

भावार्थ:

रावण ने घमंड से पूरी कथा सुनाई कि उसने किस प्रकार सीता का हरण किया।

🔟 आगे की चौपाइयाँ (संक्षेप भावार्थ)

रावण बताता है कि:

वानरों ने अनेक राक्षसों को मार दिया।

दुर्मुख, अतिकाय, अकम्पन जैसे बलवान योद्धा मारे गए।

महोदर आदि वीर भी युद्ध में गिर पड़े।

इससे वह कुम्भकर्ण से सहायता माँगता है।

✅ समग्र विवेचन:

इन चौपाइयों में तीन मुख्य बातें दिखाई देती हैं—

हनुमान की सेवा और राम की कृतज्ञता – भगवान भी अपने भक्त के प्रेम को मान देते हैं।

राम-लक्ष्मण का भाई प्रेम – लक्ष्मण के जीवित होने पर पूरी सेना प्रसन्न होती है।

रावण की चिंता और कुम्भकर्ण का प्रवेश – युद्ध का नया और भी भयानक चरण शुरू होने वाला है।


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