लंकाकांड दोहा (62)
लंकाकांड दोहा (62) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान।।62।।
भावार्थ:
जब कुंभकर्ण ने दस सिर वाले रावण के बचन (निर्देश/आज्ञा) सुने, तो वह बहुत दुखी और बिलखने लगा। उसे अब यह समझ में आया कि रावण ने जो किया, उससे केवल विनाश और कलह का कारण बनेगा। उन्होंने रावण को समझाने की कोशिश की कि वह जगदंबा (सीता) का हरण करके गलत कार्य किया है और अब अपना कल्याण चाहता है। यानी, कुंभकर्ण का मन रावण के अधर्म से दुखी हो गया।
विस्तृत विवेचन:
कुंभकर्ण का मनोभाव – कुंभकर्ण, जो हमेशा रावण की सेना में था और उसका भाई होने के कारण उसके आदेशों का पालन करता था, अब रावण के शब्द सुनकर मन ही मन दुःखी हो गया। दसकंधर शब्द से आशय है कि रावण के कई प्रकार के आदेश या योजनाएं सुनीं गईं। कुंभकर्ण ने महसूस किया कि ये योजनाएं केवल विनाशकारी हैं।
धर्म की ओर मुड़ना – कुंभकर्ण का बिलखना इस बात का संकेत है कि अब उसका मन पाप और अधर्म से तंग है। वह जानता है कि रावण ने “जगदंबा हरि आनि” अर्थात माता सीता का हरण करके पाप किया है और अब अपना कल्याण चाहता है, जो असंभव है।
कल्याण की इच्छा – “अब सठ चाहत कल्यान” से पता चलता है कि कुंभकर्ण जानता है रावण ने अधर्म किया है, वह! बुराई और युद्ध के पक्ष में नहीं।
सारांश:
यह दोहा कुंभकर्ण के अंदर होने वाले मानसिक परिवर्तन को दर्शाता है। यह बताता है कि अंततः उसके भीतर नैतिक चेतना जाग्रत होती है, और वह रावण को अधर्म से धर्म की ओर लाने की कोशिश करता है।
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