लंकाकांड चौपाई (626-633)

 लंकाकांड चौपाई (626-633) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी।।

भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा।।

कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी।।

आवत देखि सैल प्रभू भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे।।।

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक।।

तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं।।

सोनित स्त्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे।।

बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए।।

भावार्थ :

कुंभकर्ण मन में विचार करता है कि अब राक्षस सेना नष्ट हो रही है, इसलिए वह बहुत क्रोधित हो जाता है। वह सिंह की तरह भयंकर गर्जना करता है। क्रोध में आकर वह पहाड़ उखाड़कर वानर सेना पर फेंकने लगता है।

जब वह बड़े-बड़े पर्वत लेकर प्रभु श्रीराम पर फेंकता है, तो प्रभु अपने बाणों से उन्हें काटकर धूल समान कर देते हैं। फिर श्रीराम क्रोधित होकर धनुष चढ़ाकर बहुत भयानक बाण छोड़ते हैं। वे बाण कुंभकर्ण के शरीर में प्रवेश कर निकल जाते हैं, जैसे बिजली बादल में समा जाती है।

उसके शरीर से रक्त बहने लगता है, जिससे वह ऐसा लगता है जैसे काले पर्वत पर लाल गेरू बह रही हो। उसे घायल देखकर वानर और भालू उस पर टूट पड़ते हैं, लेकिन कुंभकर्ण उन्हें देखकर हँसता है।

विस्तृत विवेचन:

कुंभकर्ण का क्रोध और पराक्रम

यहाँ कुंभकर्ण की शक्ति और युद्ध-कौशल दिखाया गया है। वह अकेला ही पूरी वानर सेना पर भारी पड़ता है। उसकी गर्जना सिंह जैसी है—यह उसके आतंक और वीरता का प्रतीक है।

श्रीराम की दिव्य शक्ति

कुंभकर्ण जितना भी बलशाली हो, लेकिन श्रीराम के सामने उसका बल टिक नहीं पाता। वे बड़े-बड़े पर्वतों को भी अपने बाणों से धूल बना देते हैं—यह उनकी दिव्यता दर्शाता है।

बाणों का प्रभाव (उपमा अलंकार)

बाणों का शरीर में प्रवेश और निकलना “बिजली और बादल” की उपमा से बताया गया है। यह दृश्य युद्ध की तीव्रता और भयानकता को जीवंत करता है।

रक्त का वर्णन (चित्रात्मकता)

कुंभकर्ण के शरीर से बहता रक्त “काजल पर्वत पर गेरू” जैसा बताया गया है—यह बहुत सुंदर और प्रभावशाली चित्रण है।

अंत में व्यंग्य और वीरता

घायल होने के बाद भी कुंभकर्ण हँसता है—यह उसकी अडिग वीरता और अहंकार दोनों को दर्शाता है।

निष्कर्ष:

यह चौपाई श्रीराम की दिव्य शक्ति और कुंभकर्ण की अद्भुत वीरता—दोनों का सुंदर संगम दिखाती है। अंततः यह संदेश देती है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, धर्म (श्रीराम) के सामने टिक नहीं सकता।

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