लंकाकांड चौपाई (646-657)
लंकाकांड चौपाई (646-657) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।।
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ।।
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा।।
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा।।
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।।
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा।।
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर।।
तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना।।
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं।।
करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए।।
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए।।
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए।।
भावार्थ :
भगवान श्रीराम ने समझ लिया कि कुंभकर्ण अभी भी जीवित है। उन्होंने तुरंत धनुष चढ़ाकर तीखे बाण चलाए।
उन बाणों से कुंभकर्ण का मुख भर गया, फिर भी वह नहीं गिरा और और भी क्रोधित होकर राम की ओर दौड़ा।
वह ऐसे आ रहा था जैसे स्वयं काल (मृत्यु) सजीव हो गया हो। तब राम ने क्रोधित होकर एक प्रचंड बाण से उसका सिर काट दिया।
वह सिर उड़कर रावण के सामने जा गिरा, जिससे वह बहुत व्याकुल हो गया।
इसके बाद उसका धड़ भी भयंकर वेग से दौड़ा, तो राम ने उसे भी दो टुकड़ों में काट दिया।
वह विशाल शरीर ऐसे गिरा जैसे आकाश से पर्वत गिरता है, और उसके नीचे वानर, भालू और राक्षस दब गए।
अंत में उसका तेज (आत्मा) निकलकर राम के मुख में समा गया। यह देखकर देवता और ऋषि आश्चर्यचकित हो गए।
देवताओं ने दुंदुभि बजाई, पुष्प वर्षा की और स्तुति की।
फिर सभी देवता चले गए, और उसी समय देवर्षि नारद आए। उन्होंने आकाश से भगवान के गुण गाए और कहा—"हे प्रभु! जल्दी इस दुष्ट का अंत कीजिए।"
इससे युद्धभूमि में राम की वीरता और भी शोभायमान हो गई।
🔹 विस्तृत विवेचन
कुंभकर्ण की अद्भुत शक्ति
इतने बाण लगने के बाद भी उसका न गिरना दिखाता है कि वह अत्यंत बलशाली था। वह “काल” के समान भयंकर प्रतीत होता है।
राम का दिव्य क्रोध
सामान्य बाणों से न मरने पर राम ने तीव्र और दिव्य बाण का प्रयोग किया। इससे स्पष्ट है कि अधर्म के नाश के लिए भगवान भी कठोर रूप धारण करते हैं।
सिर का रावण के सामने गिरना
यह घटना प्रतीक है कि अब रावण का अंत निकट है—उसके सबसे शक्तिशाली सहायक का वध हो चुका।
धड़ का दो टुकड़े होना
कुंभकर्ण का शरीर पर्वत के समान था, उसका गिरना प्रलय जैसा दृश्य बनाता है—युद्ध की भीषणता का वर्णन।
तेज का राम में लीन होना
यह सबसे गूढ़ तत्व है—
👉 शत्रु होने के बावजूद कुंभकर्ण का अंत भगवान में ही हुआ
👉 इससे सिद्ध होता है कि भगवान के हाथों मारे जाने पर भी मोक्ष मिलता है
देवताओं का आनंद
अधर्म के नाश पर देवता प्रसन्न होते हैं—यह धर्म की विजय का उत्सव है।
नारद जी का आगमन
नारद का आना और वीर रस का गान करना बताता है कि यह युद्ध केवल भौतिक नहीं, बल्कि धर्म-अधर्म का महायुद्ध है।
🔹 निष्कर्ष :
धर्म की विजय निश्चित है, चाहे शत्रु कितना ही बलशाली क्यों न हो।
भगवान से संबंध (यहाँ तक कि विरोध भी) अंत में मोक्ष का कारण बन सकता है।
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