लंकाकांड दोहा (60)
लंकाकांड दोहा (60) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा
तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत।।60(क)।।
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।।60(ख)।।
भावार्थ
हनुमान जी ने कहा— हे प्रभु! मैं आपके प्रताप को अपने हृदय में धारण करके तुरंत ही जाता हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने आज्ञा ली, प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और वहाँ से चल पड़े।
जाते समय पवनपुत्र हनुमान अपने मन में बार-बार भरत जी की भुजाओं के बल, उनके उत्तम स्वभाव, गुणों और भगवान राम के चरणों के प्रति उनकी अपार प्रेम-भक्ति की सराहना करते रहे।
विस्तृत विवेचन
यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए जा रहे होते हैं और मार्ग में उनका मिलन भरत जी से होता है। भरत जी को पहले भ्रम होता है कि कोई राक्षस आ रहा है, इसलिए वे बाण चलाते हैं। बाद में जब उन्हें पता चलता है कि यह तो भगवान राम के दूत हनुमान हैं, तब वे अत्यंत प्रेम और सम्मान से उनका आदर करते हैं और उन्हें शीघ्र जाने की आज्ञा देते हैं ताकि लक्ष्मण जी का जीवन बच सके।
हनुमान जी भरत जी की विनम्रता, पराक्रम और प्रभु राम के प्रति उनकी गहरी भक्ति को देखकर बहुत प्रभावित होते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि मैं प्रभु के प्रताप को हृदय में रखकर तुरंत जाता हूँ। यह कथन उनके कर्तव्य-निष्ठा और प्रभु के कार्य को सर्वोपरि मानने का संकेत देता है।
जब हनुमान जी वहाँ से आगे बढ़ते हैं, तब वे मन-ही-मन भरत जी के बल, शील, गुण और रामभक्ति की बार-बार प्रशंसा करते हैं। यहाँ तुलसीदास जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि भरत जी केवल पराक्रमी ही नहीं, बल्कि अत्यंत विनम्र, धर्मनिष्ठ और भगवान राम के प्रति पूर्ण समर्पित भक्त हैं। हनुमान जैसे महान भक्त भी उनके गुणों की सराहना करते हैं।
सार
इस दोहे में दो मुख्य बातें प्रकट होती हैं—
हनुमान जी की कर्तव्यनिष्ठा और प्रभु राम के प्रताप पर उनका अटूट विश्वास।
भरत जी की महान भक्ति, विनम्रता और पराक्रम, जिसकी प्रशंसा स्वयं हनुमान जी करते हैं।
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