लंकाकांड चौपाई (573-580)
लंकाकांड चौपाई (573-580) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा।।
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना।।
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक।।
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई।।
कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक।।
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा।।
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई।।
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन।।
यह चौपाइयाँ रामचरितमानस के लंका कांड की हैं। यहाँ कुंभकर्ण अपने भाई रावण को समझा रहा है और अंत में भगवान श्रीराम के दर्शन की इच्छा व्यक्त करता है।
1️⃣ चौपाई
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा।।
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना।।
भावार्थ :
कुंभकर्ण रावण से कहता है— हे राक्षसों के स्वामी! तुमने अच्छा नहीं किया। अब मुझे जगाने से क्या लाभ? अभी भी समय है, अहंकार छोड़कर श्रीराम की शरण में जाओ, इससे तुम्हारा कल्याण होगा।
विवेचन :
कुंभकर्ण स्पष्ट कहता है कि सीता हरण करके रावण ने बड़ी भूल की है। फिर भी वह उसे सलाह देता है कि अहंकार छोड़कर भगवान की शरण में चला जाए, क्योंकि भगवान की शरण ही कल्याण का मार्ग है।
2️⃣ चौपाई
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक।।
भावार्थ :
हे दशमुख! जिन श्रीराम को तुम मनुष्य समझ रहे हो, उनके सेवक तो हनुमान जैसे महान बलवान हैं।
विवेचन :
कुंभकर्ण रावण को चेतावनी देता है कि श्रीराम को साधारण मनुष्य समझना भूल है। उनके सेवक हनुमान ही इतने शक्तिशाली हैं कि लंका को जला सकते हैं, तो स्वयं श्रीराम की शक्ति कितनी महान होगी।
3️⃣ चौपाई
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई।।
भावार्थ :
हाय भाई! तुमने बहुत बड़ी गलती की और शुरुआत में मुझे यह बात बताई भी नहीं।
विवेचन :
कुंभकर्ण को दुख है कि रावण ने इतना बड़ा निर्णय उससे सलाह लिए बिना लिया। यदि पहले बताया होता तो शायद वह उसे रोक सकता था।
4️⃣ चौपाई
कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक।।
भावार्थ :
तुमने उस प्रभु से विरोध कर लिया जिनकी सेवा स्वयं शिव, ब्रह्मा और देवता करते हैं।
विवेचन :
यहाँ कुंभकर्ण बता रहा है कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि परम ब्रह्म हैं जिनकी पूजा बड़े-बड़े देवता भी करते हैं।
5️⃣ चौपाई
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा।।
भावार्थ :
मुझे जो ज्ञान नारद मुनि ने दिया था, उसे मैं तुम्हें समय आने पर बताता।
विवेचन :
कुंभकर्ण कहता है कि नारद मुनि ने पहले ही उसे श्रीराम के दिव्य स्वरूप का ज्ञान दिया था। वह उचित समय पर यह बात रावण को समझाना चाहता था।
6️⃣ चौपाई
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई।।
भावार्थ :
अब हे भाई! मुझे गले लगा लो ताकि मैं श्रीराम के दर्शन करके अपनी आँखों को सफल कर सकूँ।
विवेचन :
कुंभकर्ण समझ चुका है कि युद्ध में उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए वह पहले भाई से मिलकर फिर श्रीराम के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त करता है।
7️⃣ चौपाई
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन।।
भावार्थ :
मैं उस श्याम शरीर और कमल के समान नेत्रों वाले श्रीराम को देखने जा रहा हूँ, जो तीनों प्रकार के तापों को दूर करने वाले हैं।
विवेचन :
कुंभकर्ण भगवान राम के दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है। उनके दर्शन से जीव के तीन ताप (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) नष्ट हो जाते हैं।
✅ समग्र निष्कर्ष :
इन चौपाइयों में कुंभकर्ण का विवेक, भगवान राम के प्रति श्रद्धा और रावण को दी गई नीति-सिखावन दिखाई देती है। वह जानता है कि राम परमेश्वर हैं, फिर भी भाई-धर्म के कारण युद्ध करने जा रहा है।
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