लंकाकांड छंद एवं दोहा (71)

 लंकाकांड छंद एवं दोहा (71)का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

छं0-संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।

श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी।।

भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।

कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने।।

दो0-निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।

गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम।।71।

छंद और दोहा का सरल भावार्थ + विवेचन (लंकाकांड)

🔶 छंद का भावार्थ

युद्धभूमि में श्रीराम अत्यंत दिव्य और तेजस्वी रूप में विराजमान हैं। वे अपार बल वाले अयोध्या के स्वामी हैं।

उनके कमल जैसे नेत्रों वाले मुख पर श्रम (परिश्रम) के पसीने की बूंदें हैं, और शरीर पर शत्रुओं के रक्त की हल्की छींटें पड़ी हैं।

वे अपनी दोनों भुजाओं से धनुष-बाण को बार-बार चला रहे हैं, और चारों ओर वानर और भालू सेना युद्ध में डटी हुई है।

तुलसीदास जी कहते हैं—इस अद्भुत रूप की शोभा का वर्णन मैं नहीं कर सकता, क्योंकि शेषनाग (जिनके हजार मुख हैं) भी इसे पूरी तरह नहीं कह सकते।

🔶 छंद का विस्तृत विवेचन

यहाँ वीर रस + भक्ति रस दोनों का सुंदर मेल है।

श्रीराम का रूप युद्ध में भी सौंदर्य और करुणा से भरा दिखाया गया है।

पसीना = मानव रूप (लीला)

रक्त की छींटें = अधर्म का नाश

शेषनाग भी वर्णन न कर सकें → भगवान की महिमा अनंत है

👉 मतलब: भगवान युद्ध में भी करुणामय और दिव्य ही रहते हैं।

🔶 दोहा का भावार्थ

हे पार्वती जी! (गिरिजा)

भगवान श्रीराम ने उस अधम राक्षस (जैसे माली/माल्यवान आदि) को भी मारकर अपना धाम (मोक्ष) दे दिया।

इसलिए जो मनुष्य मूर्ख होकर श्रीराम का भजन नहीं करते, वे बहुत ही मंदबुद्धि हैं।

🔶 दोहा का विस्तृत विवेचन

श्रीराम दुश्मनों को भी मोक्ष देने वाले हैं → उनकी करुणा सर्वोच्च है

राक्षस भी उद्धार पा जाते हैं → तो मनुष्य को तो जरूर भजन करना चाहिए

“मंदमति” = जो इतना आसान मार्ग (भक्ति) छोड़ देता है

👉 संदेश:

राम भक्ति सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है, इसे न अपनाना सबसे बड़ी भूल है।

✅ संक्षेप में :

श्रीराम का युद्ध रूप भी दिव्य, सुंदर और करुणामय है।

वे शत्रु को भी मोक्ष देते हैं, इसलिए हर मनुष्य को उनकी भक्ति करनी चाहिए।


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