लंकाकांड चौपाई (543-560)

 लंकाकांड चौपाई (543-560) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।।

अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ।।

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।।

मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।

सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।।

जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू।।

सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।

अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।।

जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।

अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।

बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।।

निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।।

सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी।।

उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।।

बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन।।

उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई।।

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड का है। इसमें भगवान भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के मूर्छित होने पर अत्यंत करुण विलाप करते हैं।

चौपाइयों का भावार्थ

“उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।।

रामजी लक्ष्मण को मूर्छित देखकर मनुष्य की तरह करुण वचन बोलने लगे।

“अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ।।

आधी रात बीत गई परंतु हनुमान अभी तक संजीवनी लेकर नहीं आए। रामजी लक्ष्मण को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं।

“सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।।

राम कहते हैं — हे भाई! तुम तो इतने कोमल स्वभाव के हो कि मुझे दुःखी नहीं देख सकते।

“मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।

तुमने मेरे लिए माता-पिता को छोड़ दिया और जंगल में सर्दी-गर्मी तथा कष्ट सहन किए।

“सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।।

अब वह प्रेम कहाँ गया? हे भाई! मेरी व्याकुल बातें सुनकर उठो।

“जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू।।

यदि मुझे पता होता कि वन में भाई से बिछोह होगा, तो मैं पिता की आज्ञा भी न मानता।

“सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।

संसार में पुत्र, धन, पत्नी और घर-परिवार बार-बार मिल सकते हैं।

“अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।।

परंतु सगा भाई संसार में बार-बार नहीं मिलता, इसलिए हे भाई! उठ जाओ।

“जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।

जैसे बिना पंख का पक्षी, मणि बिना सर्प और सूंड बिना हाथी असहाय हो जाते हैं।

“अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।

वैसे ही तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी व्यर्थ है, चाहे कठोर भाग्य मुझे जीवित रखे।

“जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।

मैं अयोध्या किस मुँह से जाऊँगा कि पत्नी के कारण प्रिय भाई को खो दिया?

“बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।

यदि सीता न भी मिलती तो कोई बड़ी हानि नहीं थी; अपयश भी सह लेता।

“अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।।

अब तुम्हारी मृत्यु का दुख और अपयश मेरा कठोर हृदय कैसे सह पाएगा?

“निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।।

तुम अपनी माता सुमित्रा के एकमात्र पुत्र हो और उनके प्राणों का आधार हो।

“सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी।।

उन्होंने तुम्हें मेरा हाथ पकड़ाकर मुझे सौंप दिया था और मुझे तुम्हारा सबसे बड़ा हितैषी माना था।

“उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।।

अब मैं जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? इसलिए उठो और मुझे मार्ग दिखाओ।

“बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन।।

रामजी अनेक प्रकार से विलाप करते हुए लक्ष्मण को सींचते हैं और उनके कमल जैसे नेत्रों से आँसू बहते रहते हैं।

“उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई।।

भगवान शिव पार्वती से कहते हैं— हे पार्वती! श्रीराम अखंड परमात्मा हैं, परंतु भक्तों पर कृपा करने के लिए वे मनुष्य जैसा आचरण दिखाते हैं।

विस्तृत विवेचन

भाई-प्रेम की पराकाष्ठा

इस प्रसंग में राम और लक्ष्मण का अद्वितीय भाई-प्रेम दिखाई देता है। राम बताते हैं कि संसार में धन-पत्नी मिल सकते हैं, परंतु सगा भाई नहीं।

राम का मानवीय रूप

यद्यपि राम परमात्मा हैं, फिर भी वे मनुष्य की तरह शोक व्यक्त करते हैं। इससे उनका मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप प्रकट होता है।

त्याग और समर्पण

लक्ष्मण ने राम के लिए माता-पिता और सुख छोड़ दिया। इसलिए राम स्वयं को उनके ऋण से बँधा मानते हैं।

भक्ति का संदेश

अंतिम चौपाई में शिवजी बताते हैं कि राम का यह विलाप लीला है, जिससे भक्तों को प्रेम, करुणा और संबंधों की महत्ता समझ में आए।

✅ सार:

इस प्रसंग में राम का करुण विलाप केवल भाई-प्रेम ही नहीं दिखाता, बल्कि यह भी बताता है कि परमात्मा भक्तों के साथ मनुष्य की तरह व्यवहार करते हैं और प्रेम को सर्वोच्च मूल्य मानते हैं।

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