लंकाकांड चौपाई (519-526)
लंकाकांड चौपाई (519-526) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा।।
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा।।
अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं।।
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू।।
सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा।।
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना।।
देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा।।
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी उपर कपि गयऊ।।
भावार्थ :
जब हनुमान जी ने मकरी (अप्सरा) को मारा, तो वह शाप से मुक्त होकर बोली –
“हे कपि! तुम्हारे दर्शन से मैं पापमुक्त हो गई। यह मुनि नहीं, भयानक राक्षस है।”
वह अप्सरा चली गई। तब हनुमान जी कालनेमि के पास गए और बोले –
“हे मुनि! पहले गुरु-दक्षिणा लो, फिर मुझे मंत्र देना।”
हनुमान जी ने उसकी पूँछ लपेटकर उसे पटक दिया।
मरते समय कालनेमि ने “राम-राम” कहा और प्राण त्याग दिए।
आगे हनुमान जी पर्वत पर पहुँचे, पर संजीवनी बूटी पहचान न सके।
इसलिए पूरा पर्वत ही उखाड़कर आकाश मार्ग से अयोध्या की ओर उड़ चले।
🔹 विस्तृत विवेचन
सत्य की विजय –
माया और छल (कालनेमि) अंत में नष्ट हो जाते हैं।
राम नाम की महिमा –
कालनेमि जैसा राक्षस भी मरते समय “राम-राम” कहकर मुक्ति पा गया।
हनुमान की बुद्धि और बल –
उन्होंने चालाकी से “गुरुदक्षिणा” के बहाने राक्षस का अंत किया।
कर्तव्यनिष्ठा –
संजीवनी न पहचानने पर भी हार नहीं मानी, पूरा पर्वत उठा लिया।
✨ सार:
यह चौपाई दिखाती है कि भक्ति, बुद्धि और बल – तीनों जब धर्म के लिए हों, तो विजय निश्चित है।
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