लंकाकांड चौपाई (610-617)

 लंकाकांड चौपाई (610-617) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा।।

कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई।।

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा।।

मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा।।

रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा।।

मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे।।

कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी।।

देखि राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई।।

भावार्थ:

कुंभकर्ण युद्धभूमि में ऐसे दौड़ रहा है मानो स्वयं क्रोधित काल सामने आ गया हो।

वह लाखों वानरों को पकड़-पकड़कर खा रहा है, जैसे टिड्डियाँ पहाड़ की गुफा में समा जाती हैं।

कई वानरों को पकड़कर शरीर से मसल देता है और कई को रगड़कर मिट्टी में मिला देता है।

उसके मुँह, नाक और कान तक से वानर और भालू निकल-निकल कर भाग रहे हैं।

वह युद्ध के मद में चूर होकर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पूरे संसार को ही निगल जाएगा।

उसके सामने वीर योद्धा मारे जा रहे हैं, और बचे हुए सैनिक घबराकर इधर-उधर भाग रहे हैं—उन्हें कुछ दिख नहीं रहा, न किसी की बात सुन रहे हैं।

कुंभकर्ण ने वानर सेना को बुरी तरह तहस-नहस कर दिया। यह सुनकर राक्षसों के योद्धा भी युद्ध में दौड़ पड़े।

जब श्रीराम ने अपनी सेना की यह हालत देखी, तो वे भी व्याकुल हो गए और शत्रु सेना विभिन्न प्रकार से आक्रमण करने लगी।

🔹 विस्तृत विवेचन

कुंभकर्ण = काल का रूप

तुलसीदास जी ने कुंभकर्ण को “क्रोधित काल” के समान बताया है।

➤ अर्थ: वह केवल योद्धा नहीं, बल्कि विनाश की शक्ति बन चुका है।

अत्यधिक हिंसा का चित्रण

वानरों को पकड़कर खाना, मसलना—यह उसकी राक्षसी प्रवृत्ति और अपार बल को दिखाता है।

➤ यह डर और आतंक का चरम रूप है।

सेना में भगदड़

वानर सेना इतनी भयभीत हो गई कि न देख पा रही है, न सुन पा रही है।

➤ युद्ध में मानसिक स्थिति का सुंदर चित्रण।

वीर-रस + भयानक-रस का मिश्रण

वीरता (कुंभकर्ण का पराक्रम)

भय (वानरों की दशा)

➤ दोनों रस मिलकर दृश्य को जीवंत बनाते हैं।

राम की करुणा और जिम्मेदारी

जब श्रीराम अपनी सेना को संकट में देखते हैं, तो व्याकुल होते हैं।

➤ यह उनके आदर्श नेतृत्व और करुणा को दिखाता है।

🔹 निष्कर्ष

यह चौपाई कुंभकर्ण की असीम शक्ति, राक्षसी क्रूरता और युद्ध की भयावहता को दर्शाती है, साथ ही यह भी बताती है कि जब संकट आता है, तब सच्चा नायक (राम) अपनी सेना के लिए चिंतित होकर स्वयं आगे बढ़ता है।

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