लंकाकांड दोहा (61)

 लंकाकांड सोरठा 61 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सोरठा :

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।

आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।61।। 

भावार्थ

जब श्रीराम के विलाप (दुःख भरे वचन) को वानरों के समूह ने सुना, तो उनके कान और हृदय व्याकुल हो गए। उसी समय हनुमानजी वहाँ आ पहुँचे। उनका आगमन ऐसा लगा मानो करुणा (दुःख) के बीच वीर रस का प्रकट होना हो गया हो।

विस्तृत विवेचन

प्रसंग

यह प्रसंग उस समय का है जब लक्ष्मण शक्ति लगने से मूर्छित पड़े हैं और श्रीराम अत्यंत दुःखी होकर विलाप कर रहे हैं। प्रभु के दुखभरे वचन सुनकर समस्त वानर सेना अत्यंत व्याकुल हो जाती है।

वानरों की व्याकुलता

“प्रभु प्रलाप सुनि” का अर्थ है – श्रीराम के दुख से भरे शब्द।

इन्हें सुनकर वानर सेना का हृदय दुख से भर गया। उन्हें लगा कि यदि लक्ष्मण को कुछ हो गया तो रामजी का दुःख असहनीय होगा।

हनुमानजी का आगमन

इसी बीच हनुमानजी संजीवनी बूटी लेकर लौट आते हैं।

उनका आना पूरी सेना के लिए आशा और उत्साह का कारण बन जाता है।

करुणा और वीर रस का संगम

तुलसीदास जी यहाँ बहुत सुंदर अलंकार प्रयोग करते हैं।

पहले वातावरण करुण रस (दुःख) से भरा था।

हनुमानजी के आते ही वीर रस (साहस और आशा) प्रकट हो गया।

अर्थात जैसे अंधकार में अचानक प्रकाश फैल जाए।

सार

यह सोरठा हनुमानजी की समय पर सहायता, वीरता और भगवान राम के प्रति उनकी सेवा-भावना को दर्शाता है। उनके आगमन से निराशा का वातावरण आशा और उत्साह में बदल जाता है।

काव्य-सौंदर्य

रस का सुंदर संगम – पहले करुण रस (राम का विलाप), फिर हनुमान के आने से वीर रस प्रकट होता है।

चित्रात्मकता – ऐसा दृश्य बनता है कि दुख के वातावरण में अचानक आशा और उत्साह आ जाता है।

2. अलंकार

उपमा अलंकार – “जिमि करुना महँ बीर रस” में हनुमान के आगमन की तुलना करुणा में वीर रस के प्रकट होने से की गई है।

अनुप्रास अलंकार – “बिकल भए बानर” में ‘ब’ वर्ण की पुनरावृत्ति।

3. छंद

यह सोरठा छंद है, जो Tulsidas द्वारा रचित Ramcharitmanas में प्रयुक्त हुआ है।

4. संदेश

सच्चा सेवक संकट के समय ही पहचाना जाता है।

हनुमानजी का आगमन बताता है कि भक्ति और सेवा से असंभव कार्य भी संभव हो जाता है।

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