लंकाकांड चौपाई (581-589)
लंकाकांड चौपाई (581-589)का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना।।
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा।।
देखि बिभीषनु आगें आयउ। ऊंपरेउ चरन निज नाम सुनायउ।।
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो।।
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा।।
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ।।
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन।।
धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन।।
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर।।
भावार्थ (संक्षेप में):
कुंभकर्ण युद्ध से पहले बहुत भोजन करके और मदिरा पीकर वज्र के समान गर्जना करते हुए युद्ध के लिए निकल पड़ा। उसी समय विभीषण उसके सामने आए, चरणों में गिरकर अपना परिचय दिया। कुंभकर्ण ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया, क्योंकि वह जानते थे कि विभीषण श्रीराम के भक्त हैं। विभीषण ने बताया कि रावण ने अच्छे उपदेश देने पर उन्हें लात मारकर निकाल दिया, इसलिए वे श्रीराम की शरण में आ गए। यह सुनकर कुंभकर्ण ने कहा कि रावण अब काल के वश में हो चुका है, इसलिए वह किसी की अच्छी सलाह नहीं मानेगा। फिर उसने विभीषण की प्रशंसा की कि तुमने राम का भजन करके अपने कुल को गौरवान्वित कर दिया।
विस्तृत विवेचन:
कुंभकर्ण का युद्ध के लिए प्रस्थान
चौपाई में बताया गया है कि कुंभकर्ण ने महिष (भैंस) खाया और मदिरा पीकर अत्यंत गर्जना की, जो वज्र के आघात के समान भयानक थी। वह युद्ध के उत्साह में दुर्ग से निकल पड़ा। इससे उसकी अत्यधिक शक्ति, अहंकार और युद्ध-उत्साह का वर्णन मिलता है।
विभीषण से भेंट
जब कुंभकर्ण आगे बढ़ रहा था, तब विभीषण उसके सामने आए और चरणों में गिरकर अपना नाम बताया। कुंभकर्ण ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। इससे पता चलता है कि कुंभकर्ण के भीतर भ्रातृ-स्नेह और धर्मबुद्धि भी थी।
विभीषण का दुख
विभीषण ने बताया कि उन्होंने रावण को सीता को लौटाने का हितकारी उपदेश दिया, लेकिन रावण ने उन्हें लात मारकर अपमानित कर दिया। इसलिए वे श्रीराम की शरण में चले गए।
कुंभकर्ण की समझ
कुंभकर्ण ने कहा कि रावण अब काल के वश में हो गया है। जब किसी का विनाश निकट होता है, तब वह अच्छी सलाह भी नहीं मानता।
विभीषण की प्रशंसा
कुंभकर्ण ने विभीषण को धन्य कहा कि उन्होंने श्रीराम की भक्ति करके राक्षस कुल की शोभा बढ़ाई। इससे यह संदेश मिलता है कि ईश्वर भक्ति से ही सच्चा सम्मान और कल्याण मिलता है।
✅ सार:
इन चौपाइयों में तुलसीदास जी ने दिखाया है कि कुंभकर्ण राक्षस होते हुए भी धर्म और सत्य को समझता था। उसने विभीषण की भक्ति और निर्णय की प्रशंसा की और संकेत दिया कि रावण का विनाश निश्चित है।
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