लंकाकांड चौपाई (527-534)

 लंकाकांड चौपाई (527-534) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन :

परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक।।

सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए।।

बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा।।

मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी।।

जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा।।

जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया।।

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला।।

सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा।।

लंकाकांड – भरत और हनुमान प्रसंग का भावार्थ व विवेचन

📖 प्रसंग

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड का है। जब हनुमान जी संजीवनी लेने जा रहे थे, तब भरत जी ने उन्हें आकाश में देखकर बाण चला दिया। बाण लगते ही हनुमान जी मूर्छित होकर गिर पड़े।

✨ भावार्थ:

1️⃣ "परेउ मुरुछि..."

बाण लगते ही हनुमान जी मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े और “राम-राम” स्मरण करने लगे।

2️⃣ "सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए..."

जब भरत जी ने राम नाम सुना, तो वे अत्यंत व्याकुल होकर तुरंत वहाँ पहुँचे।

3️⃣ "बिकल बिलोकि कीस उर लावा..."

हनुमान जी को मूर्छित देखकर भरत जी ने उन्हें हृदय से लगा लिया और कई प्रकार से जगाने का प्रयास किया।

4️⃣ "मुख मलीन मन भए दुखारी..."

भरत जी अत्यंत दुःखी हो गए। उनकी आँखों में आँसू भर आए। वे स्वयं को दोष देने लगे।

5️⃣ "जेहिं बिधि राम बिमुख..."

भरत जी कहते हैं—जिस प्रकार राम जी ने मुझे अपने से दूर किया (वनवास के कारण), उसी प्रकार यह दूसरा दुःख भी दे दिया।

6️⃣ "जौं मोरें मन बच अरु काया..."

यदि मेरे मन, वचन और शरीर से राम के चरणों में सच्ची प्रेम-भक्ति है, तो यह वानर (हनुमान) स्वस्थ हो जाए।

7️⃣ "सुनत बचन उठि बैठ कपीसा..."

भरत जी के सच्चे प्रेम और प्रार्थना से हनुमान जी तुरंत उठ बैठे और “कोसलाधीश (राम) की जय हो!” कहने लगे।

🔎 विस्तृत विवेचन

भरत की निष्कपट भक्ति –

भरत जी का प्रेम निष्काम और सच्चा है। वे स्वयं को दोष देते हैं, जबकि गलती अनजाने में हुई थी।

राम नाम की महिमा –

हनुमान जी मूर्छा में भी “राम” स्मरण करते हैं। यही उनका जीवन है।

सच्ची भक्ति की शक्ति –

भरत जी की निष्कपट प्रार्थना से हनुमान जी तुरंत स्वस्थ हो जाते हैं। यहाँ भक्ति की शक्ति दिखाई गई है।

दो महान भक्तों का मिलन –

यह प्रसंग रामभक्ति के दो महान स्तंभ—भरत और हनुमान—का भावपूर्ण मिलन है।

🌼 आध्यात्मिक संदेश

सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं होता।

संकट में “राम नाम” ही सबसे बड़ा सहारा है।

निष्कपट प्रेम से असंभव भी संभव हो जाता है।

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