लंकाकांड दोहा (70)

 लंकाकांड दोहा (70) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।

गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि।।70।।

भावार्थ :

कुंभकर्ण जोर से भयानक चिल्लाहट (चिक्कार) करता हुआ, मुँह फैलाकर तेजी से दौड़ता है।

उसकी इस डरावनी अवस्था को देखकर आकाश में रहने वाले देवता (सुर) और सिद्ध लोग भी डर जाते हैं और “हाय-हाय” कहकर घबरा उठते हैं।

🔹 विस्तृत विवेचन :

1. कुंभकर्ण का रौद्र रूप

कुंभकर्ण की “चिक्कार” = बहुत भयानक गर्जना

“बदनु पसारि” = मुँह फैलाकर जैसे सबको निगल जाएगा

👉 यहाँ उसका रूप काल (मृत्यु) जैसा दिखाया गया है

2. युद्ध में आतंक का वातावरण

“धावा” = तेज़ी से आक्रमण करना

वह बिना रुके वानर सेना पर टूट पड़ता है

👉 पूरा युद्धक्षेत्र डर और विनाश से भर जाता है

3. देवताओं का भी भयभीत होना

“गगन सिद्ध सुर” = आकाश में रहने वाले देवता और सिद्ध

वे भी “हा हा” कहकर घबरा जाते हैं

👉 इसका मतलब:

कुंभकर्ण की शक्ति असाधारण और भयानक थी

उसका आतंक केवल धरती तक सीमित नहीं था

🔹 मुख्य संदेश :

अहंकार और अधर्म की शक्ति शुरू में बहुत डरावनी लगती है

पर अंत में भगवान (श्रीराम) के सामने उसका नाश निश्चित है

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