लंकाकांड दोहा (64)
लंकाकांड दोहा (64) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
“बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर।।64।।”
1️⃣ भावार्थ
विभीषण कुंभकर्ण से कहते हैं—
हे वीर! तुम वचन, कर्म और मन से कपट छोड़कर पराक्रमी श्रीराम का भजन करो। लेकिन मुझे लगता है कि अब तुम्हें अपने और पराए का भी ज्ञान नहीं रहा, क्योंकि तुम काल (मृत्यु) के वश में हो गए हो।
2️⃣ विस्तृत विवेचन
लंका कांड में जब कुंभकर्ण युद्ध के लिए निकलता है, तब विभीषण उससे मिलते हैं और उसे समझाने का प्रयास करते हैं। इस दोहे में विभीषण की करुणा और धर्मबुद्धि स्पष्ट दिखाई देती है।
विभीषण कुंभकर्ण से कहते हैं कि मन, वचन और कर्म से छल छोड़कर श्रीराम की शरण ग्रहण कर लो, क्योंकि राम केवल योद्धा ही नहीं बल्कि धर्म और करुणा के स्वरूप हैं।
लेकिन वे यह भी कहते हैं कि अब तुम्हें सही-गलत की समझ नहीं रही। तुम काल के वश में होकर युद्ध करने जा रहे हो, इसलिए तुम्हें हित की बात समझ नहीं आ रही।
इस दोहे में एक गहरा आध्यात्मिक संकेत भी है—
जब मनुष्य अहंकार और मोह में पड़ जाता है, तब वह सही सलाह को भी नहीं मानता। तब कहा जाता है कि वह काल के अधीन हो गया है।
3️⃣ आध्यात्मिक संदेश
मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए।
अहंकार और मोह मनुष्य की बुद्धि को नष्ट कर देते हैं।
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