लंकाकांड दोहा (65)

 लंकाकांड दोहा (65) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।

काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव।।65।।

1. भावार्थ

इस दोहे में वर्णन है कि कुंभकर्ण ने अपने अपार बल से अंगद आदि अनेक वानरों को मूर्छित कर दिया और सुग्रीव को भी पकड़ लिया। फिर वह वानरराज सुग्रीव को अपनी काँख में दबाकर लंका की ओर चल पड़ा।

अर्थात् कुंभकर्ण का बल इतना प्रचंड था कि उसने युद्धभूमि में अनेक वीर वानरों को परास्त कर दिया और सुग्रीव को पकड़कर ले जाने लगा।

2. प्रसंग

यह प्रसंग उस समय का है जब कुंभकर्ण युद्धभूमि में आता है। उसके आने से वानर सेना में भारी भय और हाहाकार मच जाता है।

वह अपने अद्भुत बल से अंगद सहित अनेक वानरों को घायल या मूर्छित कर देता है।

फिर वह सुग्रीव को पकड़कर अपनी बाँह में दबा लेता है और लंका की ओर चल देता है।

3. विस्तृत विवेचन

कुंभकर्ण का अपार बल

इस दोहे में कुंभकर्ण की शक्ति और पराक्रम का वर्णन किया गया है। वह अकेला ही पूरी वानर सेना पर भारी पड़ रहा था।

वानर सेना की कठिन स्थिति

अंगद जैसे वीर भी उसके सामने कुछ समय के लिए असहाय हो गए। इससे युद्ध की गंभीरता स्पष्ट होती है।

सुग्रीव का बंदी बनना

कुंभकर्ण सुग्रीव को पकड़कर ले जाता है। यह प्रसंग आगे आने वाले रोमांचक घटनाक्रम की भूमिका तैयार करता है।

धर्म और अधर्म का संघर्ष

यहाँ यह भी संकेत मिलता है कि अधर्म की शक्ति कभी-कभी बहुत प्रबल दिखाई देती है, लेकिन अंततः विजय धर्म की ही होती है, क्योंकि आगे चलकर भगवान राम कुंभकर्ण का वध करते हैं।

✅ सार:

इस दोहे में कुंभकर्ण के अद्भुत बल और युद्ध में उसकी भयंकरता का चित्रण है, जहाँ वह अंगद आदि वानरों को मूर्छित कर देता है और सुग्रीव को पकड़कर लंका की ओर ले जाने लगता है।

Comments

Popular posts from this blog

लंकाकांड चौपाई (376-383)

लंका काण्ड चौपाई (151-160)

लंकाकांड चौपाई (495--502)