लंकाकांड दोहा (69)
लंकाकांड दोहा (69) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस।।69।।
भावार्थ:
कुंभकर्ण भयंकर गर्जना करता है। वह करोड़ों वानरों को पकड़-पकड़कर हाथी की तरह धरती पर पटक देता है। उसकी शक्ति इतनी प्रचंड है कि वानर सेना उसके सामने टिक नहीं पाती। “सपथ करइ दससीस” का अर्थ है—रावण (दससीस) ने उसे युद्ध के लिए भेजा है और उसकी प्रतिज्ञा/आज्ञा का पालन करते हुए कुंभकर्ण पूरी शक्ति से युद्ध कर रहा है।
🔹 विस्तृत विवेचन
यह दोहा रामचरितमानस के लंका कांड का है, जहाँ कुंभकर्ण का युद्ध-प्रसंग चल रहा है।
1. कुंभकर्ण की असाधारण शक्ति
कुंभकर्ण कोई साधारण योद्धा नहीं है। उसकी गर्जना ही शत्रुओं के मन में भय भर देती है।
“गजराज इव” (हाथी के समान) उपमा यह बताती है कि जैसे हाथी छोटे जीवों को सहजता से कुचल देता है, वैसे ही कुंभकर्ण वानरों को उठा-पटक रहा है।
2. युद्ध का भीषण दृश्य
यहाँ युद्ध का दृश्य अत्यंत भयानक है—
चारों ओर हाहाकार
वानर सेना बिखर रही है
कुंभकर्ण अकेला ही भारी पड़ रहा है
यह दिखाता है कि अधर्म की ओर से भी कभी-कभी बहुत बड़ी शक्ति खड़ी हो सकती है।
3. कर्तव्य और निष्ठा का द्वंद्व
कुंभकर्ण के भीतर एक विशेषता है—वह जानता है कि रावण ने गलत किया है, फिर भी भाई होने के कारण उसका साथ देता है।
इस दोहे में उसकी निष्ठा (loyalty) और कर्तव्य-बोध झलकता है, भले ही वह अधर्म की ओर क्यों न हो।
4. “सपथ करइ दससीस” का गहरा अर्थ
यहाँ “सपथ” केवल क्रोध नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि वह रावण की आज्ञा और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार पूरी शक्ति से युद्ध कर रहा है।
यह उसकी प्रतिबद्धता (commitment) को दर्शाता है।
🔹 गूढ़ संदेश :
केवल शक्ति महान नहीं बनाती—धर्म के बिना वही शक्ति विनाश का कारण बनती है।
गलत व्यक्ति के प्रति निष्ठा भी अंततः पतन की ओर ले जाती है।
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