लंकाकांड चौपाई (658-668)
लंकाकांड चौपाई (658-668) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी।।
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा।।
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।।
बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई।।
रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी।।
मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ।।
देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई।।
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ।।
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना।।
इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा।।
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।भावार्थ:
दिन के अंत में दोनों सेनाएँ वापस लौटती हैं, सभी योद्धा थक जाते हैं।
श्रीराम की कृपा से वानरों की शक्ति बढ़ती जाती है, जैसे सूखी घास आग पाकर भड़क उठे।
राक्षस दिन-रात कमजोर होते जाते हैं—उनके अपने कर्म ही उन्हें नष्ट कर रहे हैं।
रावण बार-बार अपने मरे हुए भाइयों के सिर को सीने से लगाकर विलाप करता है।
स्त्रियाँ रोती हैं और रावण के बल-तेज का स्मरण करती हैं।
तभी मेघनाद आता है और रावण को समझाता है—
“पिताजी! आपने मेरी शक्ति नहीं देखी, मैं अपने इष्टदेव से प्राप्त बल से युद्ध करूँगा।”
सुबह होते ही चारों द्वारों पर वानर सेना आ जाती है।
दोनों ओर से भयंकर युद्ध शुरू होता है—वानर और राक्षस अपने-अपने विजय हेतु लड़ते हैं।
🔹 विस्तृत विवेचन :
1. श्रीराम का दिव्य वीर रूप
यहाँ श्रीराम को एक आदर्श योद्धा के रूप में दिखाया गया है—
शरीर पर श्रम और रक्त → मानव रूप
परंतु तेज और प्रभाव → ईश्वर स्वरूप
👉 यह बताता है: ईश्वर भी कर्म करके ही धर्म की रक्षा करते हैं।
2. राक्षसों को मोक्ष देना
श्रीराम केवल वध नहीं करते, बल्कि उद्धार (मोक्ष) भी देते हैं।
👉 यह उनकी करुणा और भगवानत्व को दर्शाता है।
3. कर्म का सिद्धांत
“छीजहिं निसिचर…” → राक्षस अपने ही पापों से नष्ट हो रहे हैं।
👉 संदेश: बुरे कर्म का फल निश्चित है।
4. रावण की मानसिक स्थिति
बाहर से शक्तिशाली, अंदर से दुखी और टूट चुका।
👉 अहंकार अंत में दुख ही देता है।
5. मेघनाद का आत्मविश्वास
वह अपनी शक्ति पर गर्व करता है, परंतु यह अहंकार आगे उसके विनाश का कारण बनेगा।
6. युद्ध का व्यापक चित्रण
दोनों सेनाओं का बराबरी से युद्ध
वीरता, भय, करुणा—सभी रसों का सुंदर मिश्रण
👉 यही “वीर रस” की पराकाष्ठा है।
🔹 संक्षेप में :
श्रीराम का युद्ध = धर्म, करुणा और वीरता का संगम।
राक्षसों का नाश = उनके अपने कर्म + भगवान की लीला।
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