लंकाकांड दोहा (68)
लंकाकांड दोहा (68) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच।।
🔹 भावार्थ:
प्रभु श्रीराम के बाणों ने एक ही क्षण में भयानक राक्षसों को काट डाला।
फिर वे सभी बाण वापस आकर श्रीराम के तरकस (निषंग) में प्रवेश कर गए।
🔹 विस्तृत विवेचन
प्रभु के बाणों की शक्ति
भगवान श्रीराम के बाण साधारण नहीं, दिव्य और अचूक हैं। वे पल भर में ही विकराल राक्षसों (पिशाचों) का संहार कर देते हैं।
👉 यहाँ उनकी असीम शक्ति और युद्ध कौशल दिखता है।
बाणों का वापस आना (दिव्यता)
सामान्य तीर एक बार चलकर खत्म हो जाते हैं, लेकिन श्रीराम के बाण लक्ष्य को मारकर वापस तरकस में लौट आते हैं।
👉 यह उनकी ईश्वरीय शक्ति और अलौकिक अस्त्र-विज्ञान को दर्शाता है।
🔹 गूढ़ अर्थ :
प्रभु के बाण = धर्म और सत्य
राक्षस = अधर्म और बुराई
👉 जब सत्य चलता है, तो बुराई तुरंत नष्ट हो जाती है और सत्य सदा सुरक्षित रहता है।
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