लंकाकांड चौपाई (618-625)
लंकाकांड चौपाई (618-625) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा।।
प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा।।
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा।।
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा।।
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा।।
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं।।
लागत बान जलद जिमि गाजहीं। बहुतक देखी कठिन सर भाजहिं।।
रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं।।
भावार्थ :
भगवान श्रीराम धनुष-बाण सजाकर युद्ध के लिए निकलते हैं। जब वे धनुष की टंकार करते हैं, तो उसकी भयानक ध्वनि से राक्षसों की सेना भयभीत हो जाती है। वे सत्यव्रती राम असंख्य बाण छोड़ते हैं, जो ऐसे लगते हैं जैसे पंख वाले कालसर्प दौड़ रहे हों। उन बाणों से राक्षसों के शरीर के अंग—सिर, हाथ, पैर—कटकर गिरने लगते हैं। कई योद्धा घायल होकर गिरते हैं, फिर उठकर लड़ने लगते हैं। बाण बादल की गर्जना जैसे लगते हैं। कई राक्षसों के सिर कट जाते हैं, फिर भी वे बिना सिर के “मारो-मारो” चिल्लाते हुए दौड़ते हैं।
विस्तृत विवेचन :
राम का वीर रूप:
यहाँ श्रीराम का रूप एक दिव्य योद्धा का है—धर्म के लिए युद्ध करने वाले। उनका धनुष टंकार ही शत्रु को डराने के लिए काफी है।
बाणों की उपमा:
बाणों को कालसर्प (मृत्यु के साँप) जैसा बताया गया है—अर्थात वे अचूक और विनाशकारी हैं।
युद्ध का भयानक दृश्य:
अंग-भंग, रक्तपात, और बिना सिर के दौड़ते योद्धा—यह सब युद्ध की भीषणता दिखाता है।
राक्षसों का जिद्दी स्वभाव:
घायल होने के बाद भी राक्षस फिर उठकर लड़ते हैं—यह उनकी हठ और अधर्म की जड़ता को दर्शाता है।
मुख्य संदेश:
👉 धर्म (राम) की शक्ति इतनी प्रबल है कि अधर्म (राक्षस) टिक नहीं सकता।
👉 युद्ध केवल शारीरिक नहीं, बल्कि सत्य और असत्य का संघर्ष है।
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