लंकाकांड चौपाई (590-599)

 लंकाकांड चौपाई (590-599) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन।।

नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा।।

एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना।।

लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर।।

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा।।

मुर् यो न मन तनु टर् यो न टार् यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो।।

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। पर् यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो।।

पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता।।

पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि।।

चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई।।

भावार्थ:

“बंधु बचन सुनि चला बिभीषण…”

भाई के वचन सुनकर विभीषण वहाँ से चले गए जहाँ तीनों लोकों के स्वामी राम हैं।

उधर कुंभकर्ण पर्वत जैसे विशाल शरीर वाला युद्ध के लिए निकल पड़ा।

“एतना कपिन्ह सुना जब काना…”

जब वानरों ने यह सुना कि कुंभकर्ण युद्ध में आ रहा है, तो वे जोर-जोर से चिल्लाते हुए उस पर टूट पड़े।

“लिए उठाइ बिटप अरु भूधर…”

वानर और भालू पेड़-पर्वत उठाकर कुंभकर्ण पर फेंकने लगे।

“कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा…”

करोड़ों पर्वत शिखरों के समान प्रहार हुए, पर कुंभकर्ण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

“मुर् यो न मन तनु टर् यो…”

वह तनिक भी नहीं डिगा, जैसे हाथी पर फल फेंकने से कोई असर नहीं होता।

“तब मारुतसुत मुठिका हन्यो…”

तब हनुमान ने उसे मुक्का मारा जिससे वह धरती पर गिरकर व्याकुल हो गया।

“पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता…”

फिर उठकर उसने हनुमान को मारा जिससे वे भूमि पर गिर पड़े।

“पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि…”

फिर उसने नल और नील को भी जमीन पर पटक दिया।

“चली बलीमुख सेन पराई…”

उसके बल को देखकर वानर सेना डरकर भागने लगी।

2️⃣ विस्तृत विवेचन

1. कुंभकर्ण का विवेक

यहाँ कुंभकर्ण स्वीकार करता है कि रावण का विनाश निश्चित है क्योंकि वह काल के वश में हो गया है।

फिर भी वह भाई धर्म के कारण युद्ध करने जाता है।

2. विभीषण की धर्मनिष्ठा

कुंभकर्ण विभीषण की प्रशंसा करता है कि उसने भगवान राम की शरण लेकर राक्षस कुल का नाम उज्ज्वल किया।

3. युद्ध का अद्भुत दृश्य

वानर सेना पेड़-पर्वत उठाकर कुंभकर्ण पर हमला करती है, पर उसका शरीर इतना विशाल और शक्तिशाली है कि उसे कोई असर नहीं होता।

4. वीरता का प्रदर्शन

हनुमान, नल, नील जैसे वीर उससे भिड़ते हैं। इससे युद्ध की भीषणता और वीरता दोनों का वर्णन मिलता है।

5. भय और पराजय का वातावरण

कुंभकर्ण की शक्ति देखकर वानर सेना में भय फैल जाता है और सेना तितर-बितर होने लगती है।

✅ सार:

इन चौपाइयों में कुंभकर्ण की शक्ति, वीरता और युद्ध की भयानकता का वर्णन है, साथ ही विभीषण की धर्मनिष्ठा और रामभक्ति की प्रशंसा भी की गई है।

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