लंकाकांड चौपाई (764-771) एवं छंद
लंकाकांड चौपाई(764-771) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना।।
हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा।।
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते।।
एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं।।
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं।।
उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं।।
निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू।।
बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे।।
छं0-क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं।
मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं।।
मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं।
चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं।।
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं।
प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं।।
धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही।
जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही।।
यह अंश रामचरितमानस के लंका कांड से लिया गया है। इसमें युद्ध का अत्यंत जीवंत और भयंकर वर्णन है।
🔶 भावार्थ (Simple meaning)
देवता (जैसे ब्रह्मा आदि), सिद्ध और मुनि आकाश में विमान पर बैठकर राम-रावण युद्ध देख रहे हैं। भगवान शिव भी पार्वती के साथ इस युद्ध को देख रहे हैं।
वानर और राक्षस दोनों ही युद्ध के उत्साह में डूबे हैं।
वानर श्रीराम के बल से प्रेरित होकर वीरता दिखा रहे हैं।
दोनों पक्ष के योद्धा आपस में भयंकर युद्ध कर रहे हैं—मारना, काटना, पटकना, सिर तोड़ना आदि।
भालू और वानर राक्षसों को जमीन में गाड़ देते हैं, उनके ऊपर मिट्टी डाल देते हैं। पूरा युद्ध ऐसा लगता है जैसे स्वयं काल (मृत्यु) क्रोधित होकर प्रकट हो गया हो।
🔶 छंद का भावार्थ
वानर क्रोध में यमराज (काल) के समान दिख रहे हैं, उनके शरीर से रक्त बह रहा है।
वे राक्षसों को ऐसे कुचल रहे हैं जैसे बादल गरजते हुए सब कुछ नष्ट कर दें।
थप्पड़, दाँत, लात—हर तरीके से प्रहार हो रहा है
वानर और भालू छल-बल से युद्ध कर रहे हैं
गाल फाड़ देना, छाती चीर देना—भीषण युद्ध दृश्य
ऐसा लगता है जैसे भगवान विष्णु (नरसिंह रूप में) युद्धभूमि में खेल रहे हों।
चारों ओर “मारो-काटो” की भयंकर आवाज़ गूंज रही है।
जो श्रीराम का नाम लेते हैं, उनके लिए तिनका भी वज्र (शक्ति) बन जाता है, और बिना राम के वज्र भी तिनके जैसा कमजोर हो जाता है।
🔶 विस्तृत विवेचन (Deep explanation)
युद्ध का अलौकिक दृश्य
यहाँ युद्ध सिर्फ भौतिक नहीं, बल्कि दैवीय स्तर का है। देवता भी इसे देखने आते हैं—यह बताता है कि यह साधारण युद्ध नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का अंतिम संघर्ष है।
वानरों की शक्ति का रहस्य
वानर स्वभाव से साधारण हैं, लेकिन
👉 श्रीराम की कृपा से असाधारण बन जाते हैं
👉 “राम बल” ही उनकी विजय का कारण है
काल (मृत्यु) का रूपक
युद्ध को “क्रुद्ध काल” जैसा बताया गया है
👉 संकेत: राक्षसों का अंत निश्चित है
👉 यह अधर्म के विनाश का समय है
नरसिंह रूप की उपमा
वानरों की उग्रता को नरसिंह अवतार से तुलना
👉 यह दर्शाता है कि ईश्वर अपने भक्तों के माध्यम से भी लीला करते हैं
राम नाम की महिमा
अंतिम पंक्ति बहुत गहरी है:
👉 राम का नाम लेने से कमजोर भी शक्तिशाली बन जाता है
👉 बिना राम के, शक्तिशाली भी कमजोर हो जाता है
🔶 निष्कर्ष (Short)
👉 यह अंश बताता है कि
धर्म की जीत निश्चित है
भगवान की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है
राम नाम ही सबसे बड़ी शक्ति है
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