लंकाकांड चौपाई (772-779) एवं छंद
लंकाकांड चौपाई (772-779) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर।।
गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा।।
लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू।।
चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी।।
इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा।।
चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना।।
पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई।।
तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने।।
छं0-संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं।
रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं।।
भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे।
रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे।।
भावार्थ :
रावण अत्यंत क्रोधित होकर युद्धभूमि में दौड़ पड़ा। उसे सामने आता देख वानर (जैसे हनुमान, अंगद आदि) जोर-जोर से ललकारने लगे।
वानरों ने पेड़, पत्थर, पहाड़ उठाकर रावण पर एक साथ फेंक दिए, लेकिन रावण का शरीर वज्र (इंद्र के अस्त्र) जैसा कठोर था—उन सबका उस पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि वे टुकड़े-टुकड़े होकर टूट गए।
रावण अपने रथ पर स्थिर खड़ा रहा, तनिक भी नहीं डिगा। फिर अत्यधिक क्रोध में आकर उसने वानरों को पकड़-पकड़कर कुचलना शुरू कर दिया। वानर और भालू सेना डरकर इधर-उधर भागने लगी और “बचाओ-बचाओ” कहते हुए अंगद, हनुमान तथा श्रीराम को पुकारने लगी।
🔶 छंद का भावार्थ:
रावण ने अपने दसों धनुषों पर बाण चढ़ाकर ऐसे छोड़े जैसे सर्प उड़कर शिकार पर टूट पड़ते हैं। उन बाणों से पूरी पृथ्वी और आकाश भर गया।
चारों दिशाओं में वानर भागने लगे, बहुत हाहाकार मच गया। पूरी सेना भयभीत और व्याकुल हो उठी। सब लोग दीन होकर पुकारने लगे— “हे श्रीराम! आप दयासागर हैं, संकट में फँसे जनों के रक्षक हैं, हमारी रक्षा कीजिए।”
🔶 विस्तृत विवेचन :
रावण की शक्ति और अहंकार
यहाँ रावण की अपार शक्ति दिखाई गई है—वह अकेले ही पूरी वानर सेना पर भारी पड़ रहा है। उसका शरीर “वज्र समान” बताया गया है, जो उसके अभिमान और बल का प्रतीक है।
वानर सेना की स्थिति
वानर वीर होते हुए भी रावण के सामने कमजोर पड़ जाते हैं। यह दिखाता है कि केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि धर्म और ईश्वर का साथ ही अंतिम विजय दिलाता है।
भगवान की शरणागति
जब सब ओर से हार दिखाई देती है, तब वानर सेना श्रीराम को पुकारती है।
👉 यह संदेश है: संकट में भगवान की शरण ही अंतिम सहारा है।
रावण के बाण = सर्प की उपमा
बाणों को “सर्प” की तरह बताया गया है, जो तेज, घातक और डरावने हैं—इससे युद्ध की भयंकरता का चित्रण होता है।
🔶 निष्कर्ष (2 points में)
रावण की शक्ति चरम पर है, लेकिन वह अधर्म के कारण अंततः हारने वाला है।
संकट में भगवान की शरण ही सच्ची रक्षा करती है।
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