लंकाकांड दोहा(82)

 लंकाकांड दोहा(82) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।

लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ।।82।।

भावार्थ :

जब लक्ष्मण जी ने अपनी सेना (वानर दल) को व्याकुल और संकट में देखा, तब उन्होंने कमर में तरकस (तीर रखने का पात्र) कस लिया और हाथ में धनुष उठा लिया। वे अत्यंत क्रोधित होकर, पहले श्रीराम के चरणों में सिर झुकाकर, युद्ध के लिए निकल पड़े।

विस्तृत विवेचन:

यह दोहा युद्ध के उस भावुक और वीर क्षण को दर्शाता है जब लक्ष्मण जी अपने कर्तव्य और भाई-भक्ति दोनों का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

सेना की स्थिति: वानर सेना रावण की शक्तिशाली सेना से परेशान होकर बिखरने लगती है। यह देखकर लक्ष्मण जी का हृदय व्यथित हो उठता है।

वीरता का जागरण: लक्ष्मण तुरंत तैयार हो जाते हैं—तरकस बांधते हैं और धनुष उठा लेते हैं। यह उनके तत्पर और निर्भीक योद्धा स्वभाव को दिखाता है।

क्रोध और धर्म: उनका क्रोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए है।

मर्यादा और भक्ति: युद्ध पर जाने से पहले वे श्रीराम के चरणों में सिर झुकाते हैं। इससे उनकी विनम्रता, अनुशासन और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण प्रकट होता है।

मुख्य संदेश:

👉 सच्चा वीर वही है जो धर्म के लिए क्रोध करे और मर्यादा के साथ कर्तव्य निभाए।

👉 लक्ष्मण जी का चरित्र हमें सिखाता है कि शक्ति और विनम्रता साथ-साथ चल सकती हैं।


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