लंकाकांड दोहा (80)
लंकाकांड दोहा (80) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।80(क)।।
सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज।।80(ख)।।
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान।
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन।।80(ग)।।
भावार्थ (सरल):
भगवान श्रीराम कहते हैं—हे मित्र! जो व्यक्ति इस संसार रूपी महान शत्रु को जीत सकता है, वही सच्चा वीर है, और उसके पास एक दृढ़ “धर्मरथ” (आध्यात्मिक रथ) होता है।
यह सुनकर विभीषण प्रसन्न होकर श्रीराम के चरण पकड़ लेते हैं और कहते हैं—हे कृपा के सागर! आपने मुझे उपदेश देकर अनुग्रह किया।
उधर रावण की सेना और इधर राम की ओर से अंगद-हनुमान आदि वीर अपने-अपने स्वामी के लिए युद्ध कर रहे हैं।
विस्तृत विवेचन:
संसार रूपी शत्रु का अर्थ
यहाँ “संसार” को सबसे बड़ा शत्रु कहा गया है—क्योंकि इसमें मोह, लोभ, क्रोध, अहंकार जैसे दोष हैं।
श्रीराम बताते हैं कि असली वीर वही है जो इन आंतरिक शत्रुओं पर विजय पा ले।
धर्मरथ का रहस्य
“रथ” यहाँ प्रतीक है—
सत्य = पहिए
धैर्य = धुरी
बल = घोड़े
विवेक = सारथी
अर्थात, जीवन में गुणों से बना “आध्यात्मिक रथ” ही सफलता दिलाता है, न कि केवल बाहरी हथियार।
विभीषण की प्रतिक्रिया
विभीषण समझ जाते हैं कि यह उपदेश केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए है।
इसलिए वे आनंदित होकर श्रीराम के चरण पकड़ लेते हैं—यह उनकी भक्ति और कृतज्ञता दर्शाता है।
युद्ध का दृश्य (प्रतीकात्मक अर्थ)
रावण = अहंकार, अधर्म
राम की सेना = धर्म, भक्ति, सेवा
अंगद, हनुमान आदि का युद्ध यह दर्शाता है कि जीवन में धर्म और अधर्म का संघर्ष निरंतर चलता रहता है।
निष्कर्ष (Short):
👉 असली जीत बाहरी नहीं, अंदर की होती है।
👉 धर्म, सत्य और विवेक ही जीवन का “विजयी रथ” हैं।
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