लंकाकांड चौपाई (740-752) एवं छंद

 लंकाकांड चौपाई (740-752) एवं छंद का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा।।

बिबिध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना।।

चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे।।

बरन बरद बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया।।

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी।।

चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं।।

उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई।।

पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं।।

भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई।।

केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं।।

कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा।।

हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई।।

यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई।।

छं0-धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते।

मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते।।

नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं।

जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं।।

प्रस्तावना

लंका कांड का यह प्रसंग उस समय का है जब रावण अपनी विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए निकलता है। यह दृश्य केवल युद्ध का नहीं, बल्कि अहंकार और धर्म के बीच होने वाले अंतिम संघर्ष का प्रतीक है।

📖 चौपाई का भावार्थ:

रावण की चतुरंगिनी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) अत्यंत विशाल और भयानक रूप में युद्ध के लिए आगे बढ़ती है। विभिन्न प्रकार के ध्वज, पताकाएँ और अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित यह सेना जब चलती है तो धरती काँप उठती है, पर्वत हिलने लगते हैं और समुद्र भी विचलित हो जाता है।

ढोल-नगाड़ों की आवाज प्रलय के बादलों जैसी गूँजती है। सैनिक गर्जना करते हुए अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं।

रावण अपने सैनिकों को आदेश देता है कि वानरों और भालुओं को कुचल डालो, और वह स्वयं राम और लक्ष्मण को मारने की बात कहता है।

🔥 छंद का भावार्थ

वानर और भालु सेना भी पीछे नहीं रहती। वे “जय श्रीराम” का उद्घोष करते हुए युद्ध के लिए दौड़ पड़ते हैं।

उनका रूप इतना भयंकर है मानो स्वयं काल आ गया हो।

वे पर्वतों को हथियार की तरह उठाकर फेंकते हैं और बिना किसी भय के युद्ध करते हैं।

🧠 विस्तृत विवेचन

1. रावण की सेना – बाहरी शक्ति का प्रदर्शन

रावण की सेना बहुत विशाल, संगठित और शक्तिशाली दिखाई देती है।

चतुरंगिनी सेना = पूर्ण सैन्य बल

ध्वज-पताका = अभिमान और विजय की इच्छा

👉 लेकिन यह केवल बाहरी शक्ति है, जिसमें अहंकार भरा हुआ है।

2. प्रकृति का कांपना – युद्ध की भयानकता

सेना के चलने से:

धरती हिलती है

पर्वत डगमगाते हैं

समुद्र विचलित होता है

धूल से सूर्य छिप जाता है

👉 यह दृश्य युद्ध की भयावहता को दर्शाता है।

3. ध्वनि का अद्भुत चित्रण

नगाड़े = प्रलय के बादलों जैसी गर्जना

शंख और नफीरी = उत्साह और उग्रता

👉 तुलसीदास जी ने शब्दों से पूरा युद्ध दृश्य जीवंत कर दिया है।

4. वानर-सेना – भक्ति और साहस का प्रतीक

वानर और भालु:

बिना आधुनिक हथियारों के

केवल नख-दाँत और पर्वतों के सहारे

“जय श्रीराम” के उद्घोष के साथ

👉 यह दिखाता है कि भक्ति और आत्मविश्वास सबसे बड़ा बल है।

5. रावण का अहंकार vs धर्म की शक्ति

रावण = अहंकार, अत्याचार

राम की सेना = धर्म, भक्ति, सत्य

👉 यह संघर्ष केवल युद्ध नहीं, बल्कि अधर्म और धर्म के बीच की लड़ाई है।

🏁 निष्कर्ष

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि:

केवल बाहरी शक्ति से विजय नहीं मिलती

अहंकार अंत में नष्ट हो जाता है

सच्ची शक्ति भक्ति, साहस और धर्म में होती है

👉 इसलिए जीवन में हमेशा सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए।

🙏 अंतिम विचार

जब वानर-सेना “जय श्रीराम” का नारा लगाकर युद्ध करती है, तो यह हमें प्रेरणा देता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास और साहस नहीं छोड़ना चाहिए।

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