लंका काण्ड दोहा (12)
लंका काण्ड दोहा 12 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।।11(क)।।
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक।।11(ख)।।
(क) और (ख) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन
दोहा 11(क)
एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।
धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।।
भावार्थ :
भगवान श्रीराम कृपा और गुणों के सागर रूप में सिंहासन पर विराजमान हैं। वे मन, वचन और कर्म से भक्तों पर अनंत दया करते हैं। जो मनुष्य सतत् प्रेम से ऐसे राम के ध्यान में लगे रहते हैं, वे धन्य हैं, उनका जीवन सफल है।
विस्तृत विवेचन
इस दोहे में तुलसीदास जी भक्ति-मार्ग की महिमा को प्रकट करते हैं।
श्रीराम कृपा के स्वरूप हैं, उनका हर गुण भक्त की रक्षा और कल्याण के लिए है।
भक्त यदि तन-मन से प्रभु का ध्यान करता है, तो वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि निरंतर स्मरण और प्रेम से आत्मा का जुड़ जाना है।
ऐसे व्यक्ति वास्तव में संसार में सबसे धन्य और पावन कहलाते हैं, क्योंकि उसका जीवन ईश्वर-केंद्रित हो जाता है।
दोहा 11(ख)
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक।।
भावार्थ
श्रीराम पूर्व दिशा की ओर देखकर उदय होते हुए चंद्रमा को देखते हैं और सभी से कहते हैं— “देखो! चंद्रमा सिंह के समान तेजस्वी और निर्भय दिखाई दे रहा है।”
विस्तृत विवेचन
इस प्रसंग में भगवान राम अपने सैनिकों के शिविर में बैठे हुए हैं
वहाँ प्रभु चंद्रमा के उदय होने का दृश्य देखकर उसका रूप और शीतलता वर्णन करते हैं।
चंद्रमा का सिंह समान असंक (निर्भय) रूप यह संकेत देता है कि जैसे चंद्रमा अंधकार को निडर होकर प्रकाश देता है।
वैसे ही धर्म और सत्य असुरों के अंधकार पर विजय पाकर चमकते हैं।
यह दृश्य सेना में उत्साह, साहस और विजय का भाव बढ़ाने के लिए भी है, क्योंकि युद्ध का समय निकट है।
सारांश
भाग मुख्य संदेश
11(क) भगवान राम कृपा और गुणों के धाम हैं; जो उन्हें निरंतर ध्यान में रखते हैं, वे धन्य हैं
11(ख) चंद्रमा को देखकर प्रभु निर्भयता और प्रकाश का प्रतीक बताते हैं, जिससे सेना में उत्साह बढ़ता है
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