लंका काण्ड दोहा (27)

 लंका काण्ड दोहा 27 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि।।

कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि।।26।।

भावार्थ :

अंगद  रावण के अहंकार को ठेस पहुंचाते हुए कहते हैं:

 —

हनुमान जी अकेले 

तुम्हारी सेना को मार डाला 

तुम्हारे उपवन को उजाड़ दिया,

पूरी लंका जला दी,

और तुम्हारे वीर पुत्र अक्षयकुमार का वध कर दिया।

हे मूर्ख रावण! वह हनुमान एक साधारण कपि था, जो तुम्हारे पुत्र को मारकर सुरक्षित चला गया? तुम्हारा मान-मर्दन करके चला गया, फिर भी तुम अपनी प्रशंसा कर रहे हो।

3️⃣ वक्ता और श्रोता की पुष्टि

वक्ता → अंगद

श्रोता → रावण

यह रावण का कथन नहीं, बल्कि अंगद का व्यंग्यात्मक और बोधक कथन है।

4️⃣ अंगद का उद्देश्य

अंगद का लक्ष्य रावण को अपमानित करना नहीं, बल्कि उसे सत्य का बोध कराना है—

यदि एक दूत (हनुमान) इतना पराक्रमी है,

तो स्वयं श्रीराम और उनकी वानर-सेना कितनी अपार शक्ति से युक्त होगी।

यहाँ अंगद रावण के अहंकार को तोड़ना चाहते हैं।

5️⃣ रावण की मानसिक स्थिति

रावण—

अंगद रावण को “सठ ” कहकर अपमान करता है,

परंतु वह वास्तविकता समझ नहीं पाता।

यह उसके विनाश का सूचक है, क्योंकि

अहंकार में डूबा व्यक्ति सामने खड़े सत्य को भी स्वीकार नहीं करता।

6️⃣ दार्शनिक संकेत

यह दोहा सिखाता है—

भक्ति से उत्पन्न शक्ति किसी भी सांसारिक बल से श्रेष्ठ होती है।

जो व्यक्ति दूत को तुच्छ समझता है, वह स्वामी की शक्ति को नहीं समझ पाता।

अहंकार अंततः नाश का कारण बनता है।

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