लंका काण्ड चौपाई (229-236)

 लंका काण्ड चौपाई 229-236 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।।

सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा।।

जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा।।

तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा।।

राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।।

पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा।।

बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन।।

सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।।

भावार्थ (संक्षेप में):

अंगद क्रोधित होकर रावण से कहते हैं—हे नीच और घमंडी! संभलकर बोल। जिस परशुराम ने सहस्त्रबाहु को जिसके हजारों भुज थे उसकी भुजा काट डाली थी, जिनका फरसा अग्नि के समान प्रचंड था, जिनके भय से असंख्य राजा समुद्र में डूबे—उनका भी घमंड  भाग गया। ऐसे पराक्रमी के आगे तू दसशीश क्यों अभागा बना फिरता है?

राम को साधारण मनुष्य कहना वैसा ही है जैसे धनुष को कामदेव कहना, नदी को गंगा कहना, पशु को कामधेनु समझना, वृक्ष को कल्पतरु मानना, अन्न को दान और रस को अमृत कहना—यानी सत्य का घोर अपमान। गरुड़ को साधारण पक्षी और मणि को पत्थर समझने जैसा अज्ञान है। हे मंदबुद्धि! वैकुण्ठ और अन्य लाभ तुच्छ हैं; रघुपति की निष्काम भक्ति ही सर्वोच्च और अनंत फल देने वाली है।

विस्तृत विवेचन:

यह चौपाई लंका काण्ड में अंगद के ओजस्वी और तर्कपूर्ण उपदेश को प्रकट करती है। अंगद रावण के अहंकार को तोड़ने के लिए उदाहरण–विरोध (तुलना द्वारा खंडन) का प्रयोग करते हैं। पहले वे परशुराम के अतुल पराक्रम का स्मरण कराते हैं—जिन्होंने हजार भुजवाले सहस्त्रबाहु को परास्त किया था, जिनके पास अग्नि-तुल्य फरसा, समुद्र तक थर्रा देने वाला तेज था, वे भी राम के सामने नतमस्तक हो गए—ताकि रावण समझे कि अहंकार वीरता के सामने टिकता नहीं।

फिर अंगद राम को “मनुज” कहने की भ्रांति पर प्रहार करते हैं। वे बताते हैं कि जैसे असाधारण को साधारण कहना घोर अज्ञान है, वैसे ही राम को सामान्य मनुष्य कहना भी अज्ञान है। धनुष–कामदेव, नदी–गंगा, पशु–कामधेनु, वृक्ष–कल्पतरु, रस–अमृत—ये सभी उपमाएँ बताती हैं कि तत्व की पहचान न होना ही पतन का कारण है।

अंत में अंगद भक्ति-तत्त्व स्थापित करते हैं—वैकुण्ठ या सांसारिक लाभ भी रघुपति की निष्काम भक्ति के सामने छोटे हैं। यही भक्ति अनंत फल देने वाली, अहंकार हरने वाली और मुक्ति का मार्ग है। संदेश स्पष्ट है: अहंकार छोड़ो, सत्य पहचानो, और राम-भक्ति स्वीकार करो—तभी कल्याण संभव है।

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