लंकाकांड चौपाई (384-393)

 लंकाकांड चौपाई (384-393) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा।।

चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर।।

चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई।।

हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी।।

सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी।।

निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना।।

जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना।।

सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना।।

उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने।।

सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा।।

भावार्थ

राम के प्रताप से प्रेरित होकर वानरों की प्रबल सेना राक्षसों के श्रेष्ठ योद्धा-दलों को मारने लगी।

वानर जहाँ-तहाँ दुर्गों पर चढ़ गए और “जय रघुवीर” का जयघोष होने लगा।

राक्षसों की सेना ऐसे भागने लगी जैसे तेज़ आँधी से बादलों का समूह तितर-बितर हो जाए।

लंका में हाहाकार मच गया—बालक रोने लगे, स्त्रियाँ व्याकुल हो गईं।

सभी मिलकर रावण को कोसने लगे कि उसके राज में यह मृत्यु का तांडव क्यों हो रहा है।

यह सुनकर रावण क्रोधित हुआ। उसने कहा—

“जो भी रण से विमुख होगा, मैं स्वयं उसे मार डालूँगा।

भोग-विलास में सब कुछ खा-पी लिया है, अब युद्धभूमि में प्राण देना ही सच्चा प्रेम है।”

रावण के उग्र वचनों को सुनकर राक्षस डर तो गए, पर लज्जा और क्रोध से भरकर युद्ध के लिए निकल पड़े।

वीर के लिए सामने से मृत्यु ही शोभा देती है—यह समझकर उन्होंने प्राणों का लोभ त्याग दिया।

📖 विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग राम–रावण युद्ध की तीव्रता और नैतिक संघर्ष को उजागर करता है।

1️⃣ श्रीराम का प्रताप

यहाँ तुलसीदास जी स्पष्ट करते हैं कि वानरों की विजय उनकी संख्या या शक्ति से नहीं, बल्कि श्रीराम के प्रताप से है। “जय रघुबीर” का उद्घोष केवल नारा नहीं, बल्कि धर्म और सत्य की शक्ति का प्रतीक है।

2️⃣ अधर्म का भय

लंका में मचा हाहाकार यह दिखाता है कि अधर्म का राज्य अंततः भय और असुरक्षा ही देता है। रावण का शासन जनता को सुरक्षा नहीं दे पा रहा।

3️⃣ रावण का चरित्र

रावण अपने सैनिकों को प्रेरित नहीं, बल्कि डर और धमकी से युद्ध में झोंकता है।

यह उसके अहंकार, क्रूरता और अधार्मिक नेतृत्व को दर्शाता है।

4️⃣ क्षत्रिय मर्यादा का संकेत

अंतिम पंक्तियों में तुलसीदास जी वीर-धर्म बताते हैं—

👉 पीठ दिखाकर जीने से सामने से मरना श्रेष्ठ है।

यही भाव राक्षसों को भी युद्ध के लिए विवश कर देता है।

🌼 निष्कर्ष

इस चौपाई में—

राम = धर्म, साहस, न्याय

रावण = अहंकार, भय, अधर्म

का स्पष्ट विरोध दिखता है। यह युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का महासंग्राम है।

Comments

Popular posts from this blog

लंकाकांड चौपाई (376-383)

लंका काण्ड चौपाई (151-160)

लंका काण्ड चौपाई (229-236)