लंकाकांड चौपाई (394-401)

 लंकाकांड चौपाई (394-401) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन :

भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।।

कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता।।

निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना।।

मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई।।

पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा।।

कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा।।

भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता।।

दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना।।

भावार्थ व विस्तृत विवेचन

चौपाई

भय आतुर कपि भागन लागे।

जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।।

कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता।

कहँ नल नील दुबिद बलवंता।।

भावार्थ:

युद्ध के भीषण रूप को देखकर कुछ वानर भयभीत होकर भागने लगे। यद्यपि पार्वती! अंत में विजय उन्हीं की होगी। कोई पुकारने लगा—अंगद कहाँ हैं? हनुमान कहाँ हैं? नल-नील और बलवान द्विविद कहाँ हैं?

विवेचन:

यहाँ शंकर जी युद्ध की क्षणिक निराशा दिखाते हैं। भक्त पक्ष में भी कभी-कभी भय आ जाता है, पर ईश्वर की कृपा से अंतिम विजय निश्चित होती है। 

निज दल बिकल सुना हनुमाना।

पच्छिम द्वार रहा बलवाना।।

मेघनाद तहँ करइ लराई।

टूट न द्वार परम कठिनाई।।

भावार्थ:

अपने दल की व्याकुलता सुनकर हनुमान जी समझ गए कि पश्चिम द्वार पर अत्यंत बलशाली शत्रु डटा है। वहाँ मेघनाद युद्ध कर रहा था और द्वार अत्यंत दृढ़ होने के कारण टूट नहीं रहा था।

विवेचन:

मेघनाद (इंद्रजीत) रावण का सबसे शक्तिशाली योद्धा है। उसका पश्चिम द्वार पर होना बताता है कि यह युद्ध का सबसे कठिन मोर्चा है। यहाँ हनुमान जी का रणनीतिक बोध प्रकट होता है।

पवनतनय मन भा अति क्रोधा।

गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा।।

भावार्थ:

पवनपुत्र हनुमान के मन में अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ और वे प्रलयकाल के समान भयंकर योद्धा बनकर गर्जना करने लगे।

विवेचन:

यह क्रोध अहंकारजन्य नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा हेतु है। हनुमान जी का क्रोध भी सेवा-भाव से उत्पन्न होता है।

कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा।

गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा।।

भावार्थ:

हनुमान जी उछलकर लंका के किले पर चढ़ गए और पर्वत उठाकर मेघनाद पर आक्रमण करने दौड़े।

विवेचन:

पर्वत उठाना हनुमान जी की अतुल शक्ति का प्रतीक है। यह दिखाता है कि जब साधारण उपाय विफल हों, तब असाधारण पराक्रम प्रकट होता है।

भंजेउ रथ सारथी निपाता।

ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता।।

दुसरें सूत बिकल तेहि जाना।

स्यंदन घालि तुरत गृह आना।।

भावार्थ:

हनुमान जी ने मेघनाद का रथ तोड़ दिया, सारथी को मार गिराया और उसके हृदय पर प्रहार किया। दूसरा सारथी मेघनाद  को व्याकुल देखकर रथ को हटाकर तुरंत घर ले गया।

विवेचन:

यह प्रसंग हनुमान जी की युद्धकला और मनोबल दोनों को दर्शाता है। शत्रु का रथ भंग होना उसके अहंकार के विनाश का प्रतीक है। यहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि अधर्म अंततः भयभीत होकर पलायन करता है।

समग्र संदेश

भय क्षणिक है, विजय निश्चित।

सच्चा बल धर्म और भक्ति से आता है।

हनुमान जी संकट में नेतृत्व और साहस का आदर्श हैं।


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