लंकाकांड चौपाई (437-444)

 लंकाकांड चौपाई (437-444) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी।।

राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही।।

उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे।।

आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा।।

माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर।।

बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन।।

जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी।।

बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो।।

भावार्थ :

रात बीतने पर चारों वानर सेनाएँ श्रीराम के पास आ पहुँचीं। श्रीराम ने कृपा दृष्टि से सबको देखा, जिससे वानरों की सारी थकान दूर हो गई। उधर लंका में रावण ने अपने मंत्रियों को बुलाकर कहा कि आधी सेना नष्ट हो चुकी है, अब शीघ्र बताओ कि क्या विचार किया जाए। तब माल्यवंत—जो अत्यंत वृद्ध, अनुभवी राक्षस और रावण की माता के पिता तथा मंत्री थे—नीति से भरे वचन बोले। उन्होंने कहा कि जब से तुम सीता का हरण करके लाए हो, तब से लगातार अपशकुन हो रहे हैं। वेद-पुराणों में जिन श्रीराम का यश गाया गया है, उनसे विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता।

विस्तृत विवेचन:

इस चौपाई में राम-कृपा, नीति-बोध और अहंकार के दुष्परिणाम को स्पष्ट किया गया है।

प्रथम भाग में श्रीराम की करुणा का अद्भुत प्रभाव दिखता है—उनकी दृष्टि मात्र से वानर सेना का श्रम नष्ट हो जाता है। यह बताता है कि प्रभु की कृपा भौतिक और मानसिक दोनों कष्टों का निवारण करती है।

द्वितीय भाग में रावण की विवशता सामने आती है। आधी सेना के नष्ट हो जाने पर वह मंत्रियों से परामर्श करता है, जो यह संकेत है कि बल और अहंकार अब साथ छोड़ रहे हैं। इसी समय माल्यवंत जैसे नीति-निष्ठ वृद्ध का प्रवेश महत्वपूर्ण है। वे रिश्ते के कारण नहीं, बल्कि धर्म और नीति के आधार पर सत्य कहते हैं।

माल्यवंत स्पष्ट रूप से बताते हैं कि सीता-हरण से ही अनिष्टों की श्रृंखला आरंभ हुई। यह अधर्म का फल है। वेद-पुराणों में जिन राम का गुणगान हुआ है, उनसे विमुख होना विनाश का कारण है—यह कथन धर्मशास्त्रीय प्रमाण भी देता है और रावण को अंतिम चेतावनी भी।

समग्र रूप से, यह चौपाई सिखाती है कि धर्म से विचलन, अहंकार और सद्बुद्धि की अवहेलना अंततः विनाश को बुलाती है, जबकि राम-कृपा श्रम, भय और संकट—तीनों का नाश करती है।

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