लंकाकांड चौपाई (471-478)
लंकाकांड चौपाई (471-478) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन :
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा।।
नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची।।
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा।।
बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा।।
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें।।
कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने।।
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया।।
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके।।
प्रसंग
यह प्रसंग मेघनाद की मायावी शक्ति का है, जब वह युद्ध में वानर सेना को डराने के लिए भयंकर माया रचता है।
✍️ भावार्थ:
आकाश में चढ़कर मेघनाद बहुत से अंगारे बरसाने लगा, और धरती से पानी की धाराएँ निकलने लगीं।
अनेक प्रकार के पिशाच-पिशाचिनियाँ “मारो-काटो” कहते हुए नाचने लगीं।
कहीं मल-मूत्र, खून, बाल और हड्डियाँ बरसने लगीं, तो कहीं पत्थरों की वर्षा होने लगी।
धूल की ऐसी वर्षा हुई कि चारों ओर अंधकार छा गया, अपना हाथ भी दिखाई नहीं देता था।
वानर सेना यह भयंकर माया देखकर घबरा गई; सबको लगा कि अब मृत्यु निश्चित है।
यह अद्भुत दृश्य देखकर भगवान राम मुस्कुराए।
उन्होंने एक ही बाण से सारी माया नष्ट कर दी, जैसे सूर्य अंधकार को मिटा देता है।
फिर कृपा-दृष्टि से वानर-भालुओं को देखा, जिससे वे फिर से बलवान होकर युद्ध में डट गए।
🌼 विस्तृत विवेचन
माया का प्रतीकात्मक अर्थ –
मेघनाद की माया केवल बाहरी भय नहीं है, बल्कि यह अज्ञान, भ्रम और अधर्म का प्रतीक है। जब मनुष्य भ्रम में पड़ता है, तो उसे सब कुछ विनाशकारी दिखाई देता है।
राम की मुस्कान –
भगवान राम का मुस्कुराना यह दर्शाता है कि सत्य और धर्म के सामने अधर्म की माया टिक नहीं सकती। उन्हें पूरा विश्वास था कि यह सब क्षणिक है।
एक बाण का महत्व –
एक ही बाण से माया का नाश होना बताता है कि ईश्वर की शक्ति अपार है। जैसे सूर्य निकलते ही अंधकार मिट जाता है, वैसे ही ज्ञान से अज्ञान दूर हो जाता है।
कृपादृष्टि का प्रभाव –
राम की कृपा से वानर सेना का भय समाप्त हो गया। इससे शिक्षा मिलती है कि ईश्वर की कृपा से मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भी साहस पा सकता है।
✨ आध्यात्मिक संदेश
माया और भय अस्थायी हैं।
सत्य और धर्म अंततः विजय पाते हैं।
ईश्वर की कृपा से ही जीवन के अंधकार दूर होते हैं।
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