लंकाकांड चौपाई (479-486)

 लंकाकांड चौपाई (479-486) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला।।

इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए।।

भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी।।

भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी।।

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं।।

मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू।।

असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा।।

देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा।।

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंका कांड का है, जहाँ वानर सेना और राक्षस सेना के बीच भयंकर युद्ध हो रहा है।

🔹 भावार्थ :

लक्ष्मण जी का स्वरूप अत्यंत वीर, तेजस्वी और प्रभावशाली था। क्रोध से उनकी आँखें लाल हो रही थीं और वे पर्वत के समान अडिग दिखाई दे रहे थे।

दसानन (रावण) ने बड़े-बड़े बलवान योद्धा भेजे। वे अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े।

वानर भी पर्वत, वृक्ष और नख (नाखून) को ही अपने अस्त्र बनाकर “जय श्रीराम” पुकारते हुए युद्ध में कूद पड़े।

दोनों ओर से भयंकर युद्ध हुआ। कोई किसी से कम नहीं था।

वानर घूँसों, लातों और दाँतों से काटते थे। राक्षस “मारो-मारो, पकड़ो-पकड़ो” चिल्लाते हुए सिर और भुजाएँ काटते थे।

चारों ओर इतनी भयंकर ध्वनि हुई कि मानो नौों खंडों (पूरी पृथ्वी) में गूँज उठी।

कटे हुए सिर और धड़ इधर-उधर दौड़ते दिखाई देते थे।

आकाश में देवता इस अद्भुत युद्ध को देखकर कभी आश्चर्य करते, तो कभी आनंदित होते थे।

🔹 विस्तृत विवेचन

वानरों का पराक्रम

वानरों के पास परंपरागत शस्त्र नहीं थे, फिर भी वे पर्वत और वृक्षों को ही हथियार बनाकर लड़े।

इससे उनकी निडरता और रामभक्ति प्रकट होती है।

राक्षसों का अभिमान

राक्षस अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे, फिर भी वानरों के उत्साह के सामने टिक नहीं पाए।

यह दर्शाता है कि धर्म और भक्ति की शक्ति बाहरी साधनों से अधिक होती है।

युद्ध का भीषण दृश्य

कवि ने “मारु-मारु”, “धरु-धरु” जैसे शब्दों से युद्ध की तीव्रता दिखाई है।

कटा हुआ सिर और धड़ दौड़ना – यह युद्ध की भयावहता का चित्रण है।

देवताओं की प्रतिक्रिया

देवता कभी चकित होते हैं, कभी प्रसन्न।

क्योंकि यह युद्ध अधर्म (रावण) और धर्म (राम) के बीच है, और धर्म की विजय निश्चित है।

🔹 मुख्य संदेश

👉 सच्ची शक्ति अस्त्र-शस्त्र में नहीं, बल्कि भक्ति, साहस और धर्म में होती है।

👉 जो “जय श्रीराम” के भाव से कार्य करता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी विजयी होता है।

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