लंकाकांड दोहा (48)

 लंकाकांड दोहा (48) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।

गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ।।47।।

भावार्थ

वानर और भालुओं की सेना ने राक्षसों पर ऐसा प्रचंड आक्रमण किया कि कुछ शत्रु मारे गए, कुछ घायल होकर गिर पड़े और कुछ योद्धा दुर्ग की प्राचीरों पर चढ़ गए। भालु और वानर वीर गर्जना करने लगे, जिससे शत्रु-सेना का बल और साहस डगमगा गया।

विस्तृत विवेचन

इस दोहे में रामसेना के अदम्य शौर्य और युद्ध-कौशल का सजीव चित्रण है। युद्धभूमि में वानर-भालुओं का आक्रमण एक साथ अनेक स्तरों पर होता है—मैदान में प्रत्यक्ष युद्ध, शत्रुओं का संहार और दुर्ग-भेदन। “कछु मारे, कछु घायल” से यह स्पष्ट होता है कि आक्रमण की तीव्रता इतनी है कि राक्षस-सेना संभल नहीं पाती। “कछु गढ़ चढ़े पराइ” युद्ध की रणनीतिक सफलता दिखाता है—दुर्ग पर अधिकार पाने का प्रयास शत्रु की रक्षा-व्यवस्था को तोड़ देता है।

“गर्जहिं भालु बलीमुख” वीरों की गर्जना केवल ध्वनि नहीं, मनोवैज्ञानिक प्रहार है। उनकी हुंकार शत्रु के मन में भय भर देती है। परिणामस्वरूप “रिपु दल बल बिचलाइ”—राक्षसों का शारीरिक बल ही नहीं, मनोबल भी टूटने लगता है। तुलसीदास यहाँ यह संकेत देते हैं कि युद्ध केवल अस्त्रों से नहीं, आत्मविश्वास और धैर्य से भी जीता जाता है।

यह दोहा यह भी सिखाता है कि जब उद्देश्य धर्मयुक्त हो और नेतृत्व राम-कृपा से संचालित हो, तब साधारण-से दिखने वाले योद्धा भी असाधारण पराक्रम दिखाते हैं। सामूहिक साहस, अनुशासन और उत्साह मिलकर शत्रु की शक्ति को बिखेर देते हैं—यही इस प्रसंग का केंद्रीय संदेश है।


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