लंकाकांड दोहा (49)
लंकाकांड दोहा 49 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।
जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।।48(क)।।
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।
सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध।।48(ख)।।
दोहा 48 (क–ख) — भावार्थ एवं विस्तृत विवेचन
दोहा (क):
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।
जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।।
भावार्थ:
हिरण्याक्ष अपने भाई हिरण्यकशिपु के साथ तथा मधु-कैटभ जैसे महाबली दैत्यों सहित अत्यन्त बलशाली थे। जिन दैत्यों का संहार भगवान ने पूर्व में किया था, वही करुणासागर प्रभु अब पुनः अवतार लेकर प्रकट हुए हैं।
विवेचन:
सचिव माल्यवंत रावण को समझाने की कोशिश करते हैं कि श्रीराम कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि वही परमेश्वर हैं जिन्होंने सृष्टि की रक्षा के लिए पहले भी अवतार लेकर दैत्य-संहार किया। मधु-कैटभ, हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु—ये सब अधर्म के प्रतीक हैं। प्रभु का अवतार करुणा से प्रेरित है; वे भक्तों की रक्षा और अधर्म के नाश हेतु समय-समय पर प्रकट होते हैं। लंका-युद्ध की पृष्ठभूमि में यह संकेत है कि रावण जैसे दुराचारी का अंत निश्चित है, क्योंकि प्रभु स्वयं सामने हैं।
दोहा (ख):
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।
सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध।।
भावार्थ:
जो प्रभु कालरूप होकर दुष्टों के वन का दहन करने वाले हैं, जो अनन्त गुणों के भंडार और घनघोर अज्ञान को नष्ट करने वाले हैं—जिनकी सेवा स्वयं शिव और ब्रह्मा करते हैं—उनसे भला कौन विरोध कर सकता है?
विवेचन:
इस दोहे में प्रभु की सर्वशक्तिमत्ता का प्रतिपादन है। वे समय (काल) के भी अधिष्ठाता हैं; दुष्टों के लिए संहारक और सज्जनों के लिए रक्षक हैं। उनके ज्ञान-प्रकाश से अज्ञान का अंधकार मिट जाता है। जब स्वयं शिव और ब्रह्मा उनके सेवक हैं, तब रावण जैसे अहंकारी का उनसे विरोध करना मूर्खता है। तुलसीदास जी यहाँ यह भाव जगाते हैं कि प्रभु के सामने किसी भी अधर्मी शक्ति का टिकना असंभव है।
समग्र भाव:
इन दोनों दोहों का संदेश यह है कि लंका-युद्ध केवल दो सेनाओं का संघर्ष नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का निर्णायक संग्राम है—और उसमें विजय सदा धर्म की ही होती है, क्योंकि धर्म का आधार स्वयं करुणासागर भगवान हैं।
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