लंकाकांड दोहा (53)

लंकाकांड दोहा (53) का भावार्थ सहित विस्तृत

 विवेचन :

दो0-आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।

लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ।।52।।

भावार्थ :

इस दोहे में बताया गया है कि लक्ष्मण जी ने भगवान राम से युद्ध के लिए जाने की आज्ञा माँगी।

राम जी की अनुमति लेकर वे अंगद आदि वानरों को साथ लेकर, हाथ में धनुष-बाण धारण कर क्रोधित अवस्था में युद्ध के लिए चल पड़े।

📖 विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड से है। जब मेघनाद की ओर से युद्ध की चुनौती मिलती है, तब लक्ष्मण जी का वीर रूप प्रकट होता है।

आज्ञा पालन का आदर्श –

लक्ष्मण जी सीधे युद्ध को नहीं जाते, बल्कि पहले श्रीराम से अनुमति लेते हैं। इससे उनका अनुशासन और मर्यादा के प्रति सम्मान प्रकट होता है।

वीरता और धर्म रक्षा –

वे क्रोधित हैं, पर उनका क्रोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए है। हाथ में धनुष-बाण लेकर उनका युद्ध हेतु प्रस्थान करना उनके पराक्रम और साहस को दर्शाता है।

अंगदादि कपि साथ –

अंगद जैसे वीर वानरों का साथ होना इस बात का संकेत है कि यह युद्ध केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच का महायुद्ध है।

🔥 निष्कर्ष

यह दोहा लक्ष्मण जी के शौर्य, अनुशासन और धर्मनिष्ठा को दर्शाता है।

वे क्रोध में भी मर्यादा नहीं छोड़ते और श्रीराम की आज्ञा लेकर ही युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं।


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