लंकाकांड दोहा (54)

 लंकाकांड दोहा (54) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।

जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ।।53।।

भावार्थ :

युद्धभूमि में बहुत अधिक रक्त (खून) बहकर गाढ़ा होकर जम गया था। उसके ऊपर धूल उड़ रही थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो अंगारों (जलते कोयलों) के ढेर पर धुआँ छाया हुआ हो।

🔸 विस्तृत विवेचन

यह वर्णन लंका के भयंकर युद्ध का है। युद्ध इतना भीषण था कि धरती पर रक्त की धाराएँ बह निकलीं और वह गाढ़ा होकर जम गया। जब उस पर धूल उड़ती थी, तो दृश्य ऐसा लगता था जैसे जलते अंगारों के ऊपर धुआँ छाया हो।

तुलसीदास जी ने यहाँ उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है।

रक्त को अंगार से

उड़ती धूल को धुएँ से तुलना की गई है।

इस दोहे के माध्यम से युद्ध की भयावहता, करुण दृश्य और विनाश की स्थिति को बहुत प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया है।

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